शनिवार, जून 16, 2018

बंगला छोड़ने का दुख और विरह पीड़ा का चरम


हमेशा सुनते आये थे कि ईट पत्थर से मकान बनता है और उसमें रहने वालों से घर. बात भी सच है कि मकान तो आप बेच खरीद सकते हो, किराये पर ले सकते हो मगर घर नहीं. घर परिवार वालों से बनता है.
टूटे परिवारों में मकान बिक जाने के दर्द से कहीं ज्यादा टीसता दर्द घर न रह जाने का और परिवार बिखर जाने का, रिश्ते टूट जाने का होता है जो ताजीवन सालता है. दोनों पक्षों का दर्द होता है यह. मगर जिस पक्ष ने षणयंत्र किया होता है वह बस  अपराधबोध से उबरने के लिए इस सोच का इस्तेमाल करता है कि दूसरा पक्ष अपना हिस्सा लूज़ कर जाने से दुखी है और इसी सोच से वह आनन्दित होने की कोशिश करता है कि देखो, मैं जीत गया. यह वैसी ही लीपा पोती है अपने अपराध बोध को खुद से और दूसरों से छिपाने के लिए जैसी कि किसी बड़े नेताओं के आने पर सड़कों में पैचवर्क करके उन रास्तों को सुधार दिया जाता है जिनसे उनकी गाड़ी गुजरने वाली होती है. वो नेता भी जानता है कि यह पैच वर्क कल मेरे चले जाने पर उखड़ जायेगा और शहर भी इस बात से भली भांति परिचित होता है. किसी को फर्क नहीं पड़ता मगर कराहती सड़के हैं और उन सड़कों का दर्द कोई नहीं समझता.
पान की दुकान पर तिवारी जी बता रहे हैं कि हम तो इस रास्ते पर तब से चल रहे हैं जब न तो यह पान की दुकान थी और न यह सड़क. बस, एक ठो कच्ची पगडंडी होती थी. अब याद करते हैं तो लगता है वो पगडंडी ही इस सड़क से बेहतर थी. कम से कम थी तो. अब तो कहते हैं कि सड़क है मगर उसे गढ्ढों के बीच में खोजना पड़ता है कि है कहाँ? जिस दिन मंत्री जी आवें उस दिन फिल्म में दिखती हिरोईन की तरह क्रीम पॉलिश लगा कर तैयार और मंत्री जी गये कि बस!! लाईट और कैमरा ऑफ..मेकअप उतरा और पहचान कर दिखाओ उसी हिरोईन को..भूत भूत चिल्ला कर भागोगे अधिकतर को देख कर.
खैर, बात चल रही थी घर और मकान की. तो रहवास के और भी अनेकों नाम हैं महल है, हवेली है, झोपड़ी है, आश्रम है, कुटिया है, झोपड़ी है, मुंबई के फुटपाथ भी बराबरी से टक्कर दे लेते हैं. होने को तो बीहड़ और जेल भी हैं जिसके राजपथ पर गुजर कर लोग वो मुकाम हासिल करते हैं जब वो चुने हुए नेता हो जाते हैं और उनको सरकारी बंगला मिल जाता है. अपवाद इसमें भी हैं कि कुछ को अपनी पढ़ाई लिखाई के जरिये और कुछ को अपनी जाति के कारण मिले आरक्षण के जरिये और कुछ को अपनी रसूक और पहचान के जरिये सरकार में ऐसे पद प्राप्त हो जाते हैं कि उन्हें भी सरकारी बंगले आवंटित हो जाते हैं.
सरकारी बंगलों और अन्य रहवासों में ठीक वही ठसक और पावर का भेद है जो नेताओं और आमजन में होता है. ये सरकारी बंगलों का ही करिश्मा हैं कि उसमें रहने वाले कभी घर नहीं जाते और न ही घर पर रहते हैं. उनसे या उनके मातहतों से पूछो कि साहेब कहाँ हैं? तब या तो वो बंगले पर होते हैं, या बंगले जा रहे होते हैं. आप को भी समाचार यही आयेगा कि मंत्री जी ने आपको बंगले पर बुलाया है.
कभी इन महानुभावों से पूछिये कि साहब, यह आपका घर है क्या? तो भले पूरा परिवार इस बंगले में रह रहा हो बरसों से मगर वो बोलेंगे कि नहीं, नहीं, मेरा घर तो मुगलसराय में है..भले ही वहाँ किरायेदार रह रहे हों. पता नहीं या तो इनको घर, मकान और बंगले की भेद नहीं समझ आता या शायद अन्य मसलों की तरह समझ कर भी समझना न चाहते हों.
जो भी हो बंगले आकर्षित करते हैं जैसे कि फिल्मी तारिकायें. वो उसमें रहने वालों को अपने मोहपाश में ठीक वैसे ही बाँध लेते हैं जैसे कि यह फिल्मी तारिकायें. जो एक बार बंगले में रहने लगता है वो यह भूल जाता है कि यह सरकारी है और इसे एक दिन खाली करना होगा. जैसे फिल्म देखते हुए तारिका के कुछ लोग ऐसे ऐसे दीवाने हो जाते हैं कि मुंबई पहुँच कर कभी उसके घर में कूद कर पक़ड़ा जायेंगे और पीटे जायेंगे, तो कभी उसकी कार पर पत्थर फेंक कर उसे न पा पाने की खीझ उतार लेते हैं. दुख तो इतना अपार कि कई बार तो फाँसी लगा कर तारिका को न पा पाने पर अपनी ईहलीला ही समाप्त कर लेने के किस्से भी हैं.
ठीक वही हाल बंगला छोड़ने के दुख का दिख रहा है. विरह पीड़ा का चरम दिखाई देता है. अव्वल तो छोड़ना नहीं चाहते, भले ही वो पद चला गया हो जिसकी वजह से बंगला मिला था. और अगर कोर्ट के आदेश के दबाव में आकर मजबूरन खाली करना ही पड़ा तो वही हिरोईन की कार पर पत्थर फैंकने और नुकसान पहुँचाने वाली बात, चलते चलते टाईल्स उखाड़ ले गये. नल तोड़ डाले, तमाम कालीन, दीवारें आदि तोड़ फोड़ डाले. बंगले को खण्डहर में तबदील कर देने की पूरी कोशिश करके रुखसती लेते हैं.
हिरोईन से मोहब्बत तो फिर भी समझे. कौन जाने कि खुदा मेहरबान हो जाये और उसका दिल एक बार को आप पर आ भी जाये और वो आपकी हो भी जाये मगर सरकारी बंगला?? वो तो हर हाल में वापस करना ही है, उससे ऐसा मोह कैसा? बात समझ के परे है.
-समीर लाल ’समीर’ 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार १७ जून, २०१८:

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2 टिप्‍पणियां:

Subhash Joshi ने कहा…

बहुत ही मार्मिक शुरुवात को समकालीन विसंगतियों का प्रासंगिक परिस्थितयों से विश्लेषण किया है , हम सभी किसी न किसी प्रकार अवांछित रूप से प्राप्त सुविधाओं में लिप्त होकर उन्हें अधिकार समझ बैठते हैं। 'समीर' जी ने व्यंग की कुशलता के साथ हमें आत्मचिंतन के लिए उत्प्रेरित किया है। अगली लेखनी के इन्तजार में......

Dr.Bhawna ने कहा…

bahut khub! bahut bahut badhai..