रविवार, जून 03, 2018

इसलिए खुद को साइकिल से अपग्रेड किया ही नहीं


पेट्रोल के तो न जाने कितने इस्तेमाल हैं. वाहन चलाने से लेकर विमान उड़ाने तक सब जगह पेट्रोल इस्तेमाल होता है. होने को तो साफसफाई, जनरेटर आदि में भी होता है, मगर वह इस्तेमाल मुख्य धारा का नहीं है इसलिए वो अगर बैगर जिक्र के भी रह जाये तो कोई फरक नहीं पड़ता. जैसे किसी नेता के द्वारा कोई नेक कार्य कर देने का जिक्र. आखिर ऐसा कार्य होता ही कितना है जो जिक्र में लाया जाये.
हाँ, पेट्रोल का एक कार्य जरुर और ऐसा है जिसका जिक्र करना चाहिये और वो है दंगाईयों द्वारा पेट्रोल बम का इस्तेमाल. सुविधा ये रहती है कि जब तक इसे चला न दिया जाये तब तक दंगाई महज पार्टी का कार्यकर्ता है और बम, शीशी में रखा पेट्रोल, जिसे ढिबरी की तरह इस्तेमाल किया जाना बताया जाता है. दोनों ही बातें दंगाई द्वारा बम चला देने के ठीक पहले तक पुलिस के द्वारा गैर कानूनी नहीं मानी जा सकती.
समाज ऐसा सुविधाभोगी हो गया है कि आज पेट्रोल के बिना जीवन सोच पाना भी कठिन हो गया है. ज्ञानी बताते हैं कि देश में ६७ साल में कुछ भी नहीं हुआ. पता नहीं फिर ६७ साल पहले बेलगाड़ी और साईकिलों से चलने वाला देश कब वाहनों से चलने लग गया और चल कर गया कहाँ अगर कुछ किया ही नहीं तो.
मेरी याद में ही दिल्ली से लेकर मेरे शहर तक को गाड़ियों से पटते देखा है. सड़कों पर गाड़ियों की संख्या में इतनी बड़ा इजाफा हो गया है कि महानगरों में सड़कें अब सड़के कम और पार्किंग लॉट ज्यादा नजर आती है. -१० किमी की दूरी भी कई घंटों में रेंगते हुए पूरी होती है. ये सब पिछले ४ सालों में तो नहीं हो गया होगा. और अगर हुआ है तो मतलब दिल्ली को प्रदुषण में ढकलने के लिए जिम्मेदार कौन? आज एक एक घर में चार चार वाहन रखना स्टेटस सिंबल बन गया है.
जिन देशों में पेट्रोल के कुएं है, उनके तो ठाठ बस पूछो न. एक जमाने में ऐसी तूती बोलती थी कि फिल्मों में किसी को बहुत पैसे वाला दिखाना होता था तो शेख की ड्रेस पहना कर खड़ा कर देते थे. जब बहुत तूती बोलती है तो एक न एक दिन नजर लग ही जाती है. अपने यहाँ ही देख लो. चार साल में ही नजर खा लिए- हद से ज्यादा तूती जो बुलवा ली. तो सारे तेल उपजाऊ देश भी नजर खाने लगे. ईराक, कुवैत सबका नूर उतर गया.अब तो खैर खाड़ी देशों की नौकरियों में भी पहले जैसी बात न रही.
दोहन की अति से अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में पेट्रोल के दामों में खलबली मची. खलबली का फायदा उठाना बाजार जानता है. जब अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में दाम १ रुपये बढ़ता तो ये ५ रुपये बढ़ा देते और जब ५ रुपये गिरता तो ये १ रुपया घटा देते. दाम बढ़ाने घटाने के खेल में सरकार को इतना मजा आने लगा कि धीरे धीरे ये सिलसिला अन्तर्राष्ट्रीय बाजार के दामों से हटकर चुनाव में अटक गया.चुनाव पास तो दाम कम और चुनाव खत्म तो दाम आसमान छूने लगे.
हालत ये हो लिए हैं कि जिस पेट्रोल से राकेट उड़ान भरता है, उसी के दामों ने ऐसी उड़ान भर ली है कि राकेट भी शरमा गया है.वो भी पेट्रोल के दाम से कह रहा है कि प्रभु आप ही नई ऊँचाई नापो, हम अब आराम करते हैं.
एक वर्ग को छोड़ दें –उनको छोड़ना ही बेहतर हैं क्यूँकि वो आम नहीं हैं तो सभी की कमर टूट गई है. तमाम कार्टून आ रहे हैं. कोई कहता है कि पेट्रोल टंकी में न डाल, गाड़ी पर डाल दे – आग लगानी है. कोई कह रहा है कि जल्दी पेट्रोल पाऊच में आयेगा ५० ग्राम के..जब इन्सान बहुत परेशान हो जाता है तो हँसने लगता है, यही चरितार्थ हो रहा है इससे भी.
तिवारी जी पान की दुकान पर बता रहे थे कि हमें तो पता था कि एक दिन ऐसा दौर आयेगा इसलिए हमने तो कभी खुद को साईकिल से अपग्रेड किया ही नहीं. इस तरह अपनी दूर दृष्टि का लोहा मनवा लेने बाद वे आगे बोले- और अब हमसे सुनो. इस सरकार ने पेट्रोल को खेला बना कर इसका पलिता खुद अपनी दुम में लगा लिया है, देखना अगले चुनाव में..खुद अपनी लंका में आग लगा कर धूं धूं तमाशा देखेंगे. समझदार साथी तो कन्ना भी काटने लगे हैं अभी से.
पेट्रोल का तो स्वभाव भी है कि आग लगती फटाक से है मगर बुझाना बहुत ही मुश्किल होता है. तो अब जब आग लगा ली है तो भुगतने के सिवाय और रास्ता भी क्या है?
कोशिश तो फिर भी करना चाहिये, कुछ तो तरीके हैं ही, शायद दुर्गति की गति को विराम न सही, विश्राम ही मिल जाये.
-समीर लाल ’समीर’
भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में जून ३, २०१८ में:

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