शनिवार, अप्रैल 14, 2018

उपवास के उपहास में जनता का सैण्डविच


अभी कुछ दिन पहले ही जिम में था. मित्रों के साथ वर्क आऊट के बाद सोना रुम में रिलेक्स करते चर्चा का विषय था कि एक लेवल तक वजन कम होने के बाद अब कम नहीं हो रहा है. किसी ने बताया कि वजन और नेताओं के व्यवहार में यही तो अंतर है. वजन जानता है कितना गिरना है कि शरीर को फायदा पहुँचे बिना नुकसान के. नेताओं के व्यवहार के पतन की कोई सीमा नहीं. खैर, उसने बताया कि एक लेवल के बाद डाईट में अंतर लाना पड़ता है तब शरीर फिर से अपनी पकड़ छोड़ता है वजन पर.
इसी सिलसिले में किसी ने इन्टरमिटेंट फास्टिंग की बात की. इसमें आपको दिन के आठ घंटे चुनने होते हैं जैसे दोपहर १२ बजे से शाम ८ बजे तक जिसमें आप कुछ भी खा पी सकते हैं मगर फिर शाम ८ बजे से अगली दुपहर १२ बजे तक आप सिर्फ पानी या ब्लैक काफी और चाय पर रहेंगे. वजन कम करने में फायदा भी खूब करती है.
किसी ने बताया कि वे कीटोन डाईट पर है, इसमें किसी भी तरह के कार्ब से उपवास है बाकी जो मन करे, जब करे तब खाओ. मुख्य मुद्दा यह है कि हम उपवासों के तरह तरह के तरीकों की बात कर रहे हैं.
फिर पता चला कि एक उपवास तब रखा जाता है जब विपक्ष पूरे सत्र भर संसद नहीं चलने देता. इस उपवास में दोनों पक्ष उपवास की जिद कर बैठे. रोजा और उपवास का भी फर्क न रखा. कोई नियम भी न बनाये, निर्जला रखना है कि फलाहार के साथ.
दिन अलग अलग चुने गये थे बस. पहले विपक्ष ने रखा और वे उपवास पर जाने के पहले खाना खाते पकड़ा गये..फिर पक्ष ने रखा और वे उपवास के दौरान खाना खाते पकड़ा गये. एक ही दिन रखते तो अन्य बातों की तरह इस पर भी आपस में समझौता कर लेते की तू मेरी मत बताना और मैं तेरी नहीं. मगर ऐसा हो न पाया.
विपक्ष की स्थिती बेहतर बनती दिखी. वे कहने लगे कि मुस्लिम भी हमारे भाई हैं. हमने रोजा वाला उपवास रखा था और रोजे पर जाने के पहले पकवान खाना एक प्रथा है. इसमें गलत क्या है और यूँ तो हिन्दु मित्र भी हमारे साथ हैं तो अगर इसे व्रत माने तो ये फलाहारी कुट्टु के आंटे का भटूरा और आलू की बिना लहसून प्याज की सब्जी थी . यह तो होटल की तारीफ कि उसने आलू को छोले के आकार में बखुबी छोटा छोटा काटा. फलाहारी की भला कब मनाही है. विपक्ष की बात में दम है चाहे रोजा मानो तो और चाहे व्रत मानो तो. दोनों मजहब साध लिए.
पक्ष बीच दोपहर सैण्डविच खाता पकड़ाया. इसे कैसे जायज ठहराया जाये? इसकी इजाजत बीच रोजा में तो नहीं. व्रत में भी किसी भी हालत में सैण्डविच का फलाहारी होना तो कभी न सुना. और इन्टरमिटेंट फास्टिंग में तो फास्टिंग वाले विंडो में ब्लैक टी और काफी या पानी के सिवाय कुछ भी अलाऊड नहीं. 
इसीलिए कहते हैं कि आसमान में मूँह उठा कर मत थूको, खुद के मूँह पर गिरेगा.
हमेशा की तरह मूल मुद्दा कि उपवास रखने का मकसद क्या था वो जाने कहां खो गया मात्र इस हल्ले में कि किसने उपवास का कैसे उपहास उड़ाया?
आमजन फिर ठगा सा देख रहा है उसका हाल पक्ष विपक्ष के बीच में फंस कर सैण्डविच वाला हो गया है. वह सोच रहा है कि क्या यही सच नहीं कि इस उपवास के चक्कर में भी अंततः फिर वो ही उपहास का पात्र बना है.
-समीर लाल समीर 

भोपाल से प्रकाशित दैनिक सुबह सवेरे में रविवार अप्रेल १५, २०१८ को प्रकाशित:


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1 टिप्पणी:

Subhash Joshi ने कहा…

An excellent satire on logic of convenience being invented by politicians to justify their wrong doing and keep befooling public. Awaiting next...