रविवार, नवंबर 05, 2017

तड़का लगाओ और ताजा समझ कर खाओ

खाने को फ्रीज कर अधिक समय तक ताजा रखने और उसे बासी और खराब होने से बचाने की परंपरा कम से कम पश्चिमी देशों में तो खूब है. शायद वजह यह हो कि जब सारे काम खुद ही करने हैं तो नित दफ्तर, बड़े शहरों की क्म्यूट की भाग दौड़ और पति पत्नी दोनों काम काजू..ऐसे में यह कैसे संभव हो कि रोज ताजा खाना बनाया जाये..समय ही कहाँ बच पाता है..बस, सारे दिन की भाग दौड़ के बाद खाना फ्रिज से निकाल कर गरम करके खा लें, वही बहुत. सप्ताहांत में पूरे हफ्ते का खाना बना कर फ्रीज कर दिया. हर रोज ले जाने वाले टिफिन भी और बस, जिन्दगी यूँ ही ताजा बासी से इतर एक अनजान डगर पर दौड़ती जाती है. न जाने किस लिए और न जाने क्यूँ..यह सोचने की भी फुरसत कहाँ!
कभी कभी एकाएक ग्लानी भाव भी होता है की हुंह..यह भी कैसी पैसा कमाने और कैरियर बनाने की दौड़..कि खाना भी ताजा नहीं खा पा रहे हैं! तब उस रोज रविवार की बनी दाल में देशी घी और मिर्चे का तड़का लगाया और खुश हो लिए ताजे का स्वाद लेकर- हो भले ही बासी मगर एक तड़का उसे ताजे का दर्जा दिला जाता है मानो दिल को बहलाने के लिए ग़ालिब ख्याल अच्छा है.
काश देश छोड़ कर निकल आये ये लोग जानते होते की खिचड़ी मात्र बिमारी में खाने की चीज नहीं है, यह राष्ट्रीय व्यंजन घोषित होने की कागार पर बटर चिकन और मलाई कोफ्ता को पछाड़ने के लिए तैयार खडी खिचड़ी है, तो शायद नित फटाफट बिना मेहनत के तैयार कर यही राष्ट्रीय भोज किया करते. न कोई बासी खाना खाने की ग्लानी होती और न ही कोई बीमारी पास फटकती. मगर इतनी ज्ञान की बात बताने वाले तो २०१४ के पहले तक भारत में थे नहीं तो क्या करते..
इस खिचड़ी के यूँ तो पुराणों में चार खास साथी बताये गए हैं:
खिचड़ी के हैं चार यार ,दही, पापड, घी ,अचार.
लेकिन फिर किसी ज्ञानी ने यह भी बताया कि खिचड़ी का स्वभाव ताश के समान है चाहो तो अकेले खेल लो या साथी हों तो उनके साथ. न साथी मिलें तो अजनबियों के साथ भी ट्रेन में बंदा गड्डी पीस ही लेता है अतः दही, पापड, घी ,अचार न भी हों...तो भी खिचड़ी को आनन्द से खाया जा सकता है..चाहो तो प्याज के साथ खा लो.
खिचड़ी ऐसे ही लोगों के ईजाद की गई थी जिनके पास समय की कमी थी..ऐसी कथा सामने आई है. डॉक्टर न जाने कब इसका श्रेय ले उड़े कि बीमारी में खिचड़ी खिलाओ. डॉक्टर भी कांग्रेसियों सा व्यवहार करते हैं बिल्कुल. २०१४ के बाद की उपलब्धियों का श्रेय पिछले ६ दशको से लूट रहे थे.  
कथा को भले ही अभी उछाल मिला हो हाल में..मगर गनीमत बस इतनी है की कम से कम इसे २०१४ के बाद की न कहा गया. कथा है कि खिलजी के आक्रमण के समय नाथ योगियों को खिलजी से संघर्ष के कारण भोजन बनाने का समय नहीं मिल पाता था. इससे योगी अक्सर भूखे रह जाते थे और कमज़ोर हो रहे थे.
इस समस्या का हल निकालने के लिए बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और सब्जी को एक साथ पकाने की सलाह दी. यह व्यंजन काफी पौष्टिक और स्वादिष्ट था. इससे शरीर को तुरंत उर्जा भी मिलती थी. नाथ योगियों को यह व्यंजन काफी पसंद आया. बाबा गोरखनाथ ने इस व्यंजन का नाम खिचड़ी रखा.
वक्त के साथ खिचड़ी ने भी रंग बदले. राजनीत में पारंगत हुई..साथी बदले. तड़के वाली खिचड़ी के साथ तरह तरह के चोखे और चटनियों ने गठबंधन कर लिया. खिचड़ी गरीबों की थाली से उछल कर राष्ट्रीय व्यंजन बनने की फिराक में लग गई. घोषित होने की बस देर है फिर तो जेड सिक्युरिटी मिल ही जायेगी जो करा देगी उसे अपने ही लोगों से दूर.एक नई ठोर...जैसे जो खादी कभी गरीबों के तन ढकने का साधन एवं सादगी की पहचान होती थी..वह आज गरीबों एवं मध्यमवर्गियों से कोसों दूर फेब इण्डिया के शोरुम में टंगी अमीरों और नेताओं की शान बढाती फेशन सिंबल बनी इठला रही है..वो दिन दूर नहीं जब असली खिचड़ी खानी हो तो पधारो म्हारे राष्ट्रीय फूड फेस्टिवल में...की धुन सुनाई पड़ेगी..
आज फैशनेबल खादी तो विदेश में रह कर पैसा कमा रहे आम भारतीय की पहुँच से भी बाहर जाती दिखती है, कल को यही हाल खिचड़ी का भी न हो जाए...यही चिंता का विषय है.
फिर पहले की तरह पश्चिम में रह रहे भारतीयों के हाथ वो ही बच रहेगा कि बासी में तड़का लगाओ और ताजा समझ कर खाओ.
हमारे समाचार चैनल इस कला में माहिर हैं तभी तो राम रहीम और हनी का बासी किस्सा आज भी तडका लगा लगा कर रोज नए व्यंजन की तरह परोस रहे हैं और हम उसे ताजा समझ कर टीआरपी की बारिश करने से बाज नही आ रहे.
-समीर लाल ‘समीर’
भोपाल से प्रकाशित सुबह सवेरे के रविवार नवम्बर ०५, २०१७ के अंक में:

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3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (06-11-2017) को
"बाबा नागार्जुन की पुण्यतिथि पर" (चर्चा अंक 2780)
पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Satish Saxena ने कहा…

बेहतरीन व्यंग्य का तड़का उस्ताद !

प्रतिभा सक्सेना ने कहा…

जैसे खिचड़ी बेचारी के दिन बहुरे ऐसे सबके बहुरें - ताज़ा तड़का तीखा-तर्रार हो तो सारा बासापन सोख लेता है, समीर जी .