रविवार, जून 20, 2010

जरा सा बखान, कुछ तस्वीरें और एक लघु कथा

पारिवारिक व्यस्तताओं के बीच नेट पर आना न के बराबर चल रहा है और इस बीच देख रहा हूँ कि ब्लॉगवाणी भी किन्हीं तकनिकी समस्यायों के तहत नई पोस्ट नहीं दिखा रहा है.

आज हालांकि एक नई पोस्ट लगाने का मन था किन्तु चूँकि इस बीच किसी को पढ़ा नहीं तो मैं अपने आपको नया कुछ लिखने या पढ़वाने का अधिकारी नहीं पाता. पहले कुछ पढ़ लूँ मित्रों को, फिर लिखूँगा भी और पढ़वाऊँगा भी. मेरी यह आदत नहीं कि किसी को पढ़ूँ न या किसी को बताऊँ न कि तुमको पढ़ लिया है और बस, अपनी अपनी पढ़वाता चलूँ और आशा लगा कर बैठ जाऊँ कि वो मुझे बतायेंगे कि आपको पढ़ा. कम से कम मुझे असहज लगता है. अपनी अपनी आदत है.

होती है कईयों की आदत कि खुद तो किसी को नमस्ते नहीं करना मगर सामने वाला नमस्ते न करे तो उसे बदतमीज करार देना और बुरा मान जाना. सही है कि जब तक तुम पावर में हो शायद लोग तुम्हारे बिना नमस्ते किये भी नमस्ते करते चलें. मगर पावर का क्या है, आज है और कल नहीं रहेगा. ये व्यवहार ही है जो जीवन भर साथ निभाता है.

तब तक आपको अपनी एक लघुकथा जो कुछ दिनों पूर्व महावीर जी के ब्लॉग मंथन पर प्रकाशित हुई थी, वो पढ़वाता हूँ. साथ ही बगीचे में नये फूल आ गये हैं, चेरी और सेब भी बस पकने की तैयारी में हैं. मौसम गरमी का सुहाना हो गया है. बैकयार्ड में पार्टियों का दौर चालू है, कुछ तस्वीरें बैक यार्ड की:

 

 

लघु कथा:

 

कर्ज चुकता हुआ??

इकलौता बेटा है.

हाल ही बी ई पूरी कर ली. मास्टर माँ बाप की आँख का तारा, उनका सपना. एक शिक्षक को और क्या चाहिये, बेटा पढ़ लिख कर इन्जिनियर बन गया.

विदेश जाकर आगे पढ़ने की इच्छा है.

शिक्षक का काम ही शिक्षा का प्रसार है, वो भला कब शिक्षा की राह में रोड़ा बन सकता है वो भी तब, जब उसका इकलौता बेटा उनका नाम रोशन करने और उनके सपने पूरे करने के लिए माँ बाप से बिछोह का गम झेलते हुए अकेला अपनी मातृ भूमि से दूर अनजान देश में जा संघर्ष करने को तैयार हो.

बैंक से एक मात्र जमा पूँजी, अपना मकान गिरवी रख, लोन लेकर मास्साब ने बेटे को आशीषों के साथ विदेश रवाना किया.

दो बरस में बेटा कमाने लायक होकर, मुश्किल से साल भर में कर्ज अदा कर देगा फिर मास्साब की और उनकी पत्नी की जिन्दगी ठाट से कटेगी. फिर वो ट्यूशन नहीं पढ़ायेंगे. बस, मन पसंद की किताबें पढ़ेंगे और साहित्य सृजन करेंगे.

अब चौथा बरस है. बेटे ने एक गोरी से वहीं विदेश में शादी कर ली है. उससे एक बेटा भी है. भारत की बेकवर्डनेस बहु और पोते दोनों के आने के लिए उचित नहीं . इसके चलते बेटा भारत आ नहीं सकता और वहाँ विदेश में घर में माँ बाप के लिए जगह नहीं और न ही कोई देखने वाला.

नई फैमली है, खर्चे बहुत लगे हैं. फोन पर भी बात करना मंहगा लगता है अतः लोन वापस करने की अभी स्थितियाँ नहीं है और न ही निकट भविष्य में कोई संभावना है. बेटे और उसकी पत्नी को बार बार का तकादा पसंद नहीं अन्यथा भी अनेक टेंशन है, जो भारतीय माँ बाप समझते नहीं,  अतः इस बारे में बात न करने का तकादा वो माँ को फोन पर दे चुका है वरना उसे मजबूर होकर फोन पर बात करना बंद करना होगा. माँ ने पिता जी को समझा दिया है और पिता ने समझ भी लिया है.

आज रिटायर्ड मास्साब ने अपने ट्यूशन वाले बच्चों को नये घर का पता दिया. कल वो उस किराये के घर में शिफ्ट हो जायेंगे.

जाने कौन सा और किसका कर्ज चुकता हुआ. कम से कम बैंक का तो हो ही गया.

साहित्य सृजन की आशा इतिहास के पन्ने चमका रही है.

इतिहास भी तो साहित्य का ही हिस्सा है!!

उसकी चमक बरकरार रखने का श्रेय तो मिलना ही चाहिये!!

-समीर लाल ’समीर’

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67 टिप्‍पणियां:

बेचैन आत्मा ने कहा…

समाज में ऐसा घटित होता रहता होगा ...जिसके कारण ऐसी कहानियां बनती हैं. पढ़कर दुःख होता है. एक कहानी याद आती 'हार की जीत' जिसमे धोखा देकर डाकू घोड़ा लूट ले जाता है. जिसका घोड़ा लूट लिया जाता है वह कहता है, "बेटा इस बात को किसी से ना कहना ...नहीं तो लोग अपाहिजों पर विश्वास करना ही बंद कर देंगे..!"

कुमार राधारमण ने कहा…

महत्वाकांक्षा और संस्कार कई बार तालमेल नहीं बिठा पाते। हममें से अधिकतर को अपने बुढ़ापे का पूर्वानुमान भी नहीं होता।

इटिप्स मोबाइल / इटिप्स ब्लाग ने कहा…

पंजाबी मे-छा गये जी तुसी ब्लाग जगत मे छा गये ।
भोजपुरी मे-तु त गरदा कदिहले बाङ ए भाई
हिन्दी मे-बहुत हि सटिक लिखा है आपने
ENGLISH-very nice post.

रंजन ने कहा…

कहानी.. पता नहीं क्यों किताबी लगाती है.. क्या वास्तव में ऐसा होता है? शायद नहीं या बहुत कम कोई हजारों लाखों ने एक.. पता नहीं मै क्यों नहीं समझ पा रहा...

कनाडा आना पड़ेगा.. चेरी खाने..

राम त्यागी ने कहा…

आ जाते है फिर से ...ऐसी क्या बात ....अकेले अकेले खड़े हैं ...कुर्सियां भी वीरान है :-)
हमारे पेड़ों को तो ७० मील के वेग की आंधी ने शुक्रवार को झकझोर सा दिया ....

लोगों का काम है कहना ....

ajit gupta ने कहा…

समीरजी, यह लघुकथा पूर्व में पढ़ी थी, भारत के अनेक घरों का यथार्थ है। चेरी और फूलों को दिखाकर अब ललचवाइए नहीं, आने की स्थिति में नहीं है। कल एक पोस्‍ट लगायी थी, आपकी टिप्‍पणी की प्रतीक्षा कर रही है।

वाणी गीत ने कहा…

ये व्यवहार ही है जो जीवन भर साथ निभाता है...
और क्या ...!!
अच्छी लघु कथा ...
तस्वीरें तो खूबसूरत हैं ही

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

जब तक बीस तीस ब्लाग पढ़ न लें तब तक अपने पर लिखने का वैसे ही मन नहीं होता।
जाने क्यों कहानी अच्छी नहीं लगी। ऐसी घटनाएँ होती है लेकिन बहुत कम।

Udan Tashtari ने कहा…

पता नहीं किन्तु मैने स्वयं ऐसी कहानी कम से कम १२ घरों में देखी है जिसमें एक दो तो मेरे बहुत करीबी हैं और हालात ये हुए कि मुझे दखल देना पड़ा स्थितियों को नियंत्रण में लाने के लिए वरना तो वो किराया देने की स्थिति में भी नहीं बचे थे..

इसी कथा के कई रुप हैं जिसमें माँ बाप का घर गिरवी रखवा कर व्यापार के लिए ऋण लेना तक शामिल देखा है.


खैर, अच्छा है अगर ऐसे वृतांत नजर में न आयें और यह मात्र किताबी कहानी बन कर रहे आप सबके लिए.

खुशदीप सहगल ने कहा…

मोटी मोटी किताबें चाटने वाले इंजीनियर साहब ने काश कहीं दो लाइनें मां-बाप के सम्मान के बारे मे भी कहीं पढ़ ली होतीं...

जय हिंद...

अजय कुमार ने कहा…

दुखद सामाजिक सत्य ।
पढ़ने बाद पढ़वाने की व्यवहारिकता अच्छी लगी ।

निर्मला कपिला ने कहा…

चूँकि इस बीच किसी को पढ़ा नहीं तो मैं अपने आपको नया कुछ लिखने या पढ़वाने का अधिकारी नहीं पाता. पहले कुछ पढ़ लूँ मित्रों को, फिर लिखूँगा भी और पढ़वाऊँगा भी. मेरी यह आदत नहीं कि किसी को पढ़ूँ न या किसी को बताऊँ न कि तुमको पढ़ लिया है और बस, अपनी अपनी पढ़वाता चलूँ और आशा लगा कर बैठ जाऊँ कि वो मुझे बतायेंगे कि आपको पढ़ा. कम से कम मुझे असहज लगता है. अपनी अपनी आदत है.
आपकी इस बात को कई बार निभाने की कोशिश करती हूँ मगर आप जितनी कर्मशील नही हूँ। फिर भी अपने ब्लाग पर आये लोगों के ब्लाग पर तो जरूर जाती हूँ और चाहती हूँ सभी आपसे इस बात की प्रेरणा लें जो केवल मेल भेज कर अपना कर्तव्य की खाना पूर्ती कर देते हैं और मेल भी इस शान से हर बार भेजते हैं कि दिल जल उठता है मगर चुप रह जाते हैं। ये व्यवहार ही है जो जीवन भर साथ निभाता है अच्छा जीवन सूत्र है। कहानी हमारे समाज के यथार्थ को दिखाती है बधाई इस के लिये।
कर

seema gupta ने कहा…

फूलो से भरी क्यारियां और चेरी के पेड़ बेहद ही लुभावने लगे,
बाकी आप ही की पंक्ति
"ये व्यवहार ही है जो जीवन भर साथ निभाता है. "
regards

संगीता पुरी ने कहा…

आपने इस लघु कथा में आज के बहुत सारे पिताओं का दर्द उकेर दिया है .. पता नहीं बच्‍चों को संस्‍कार देते वक्‍त क्‍या गल्‍ती हो जाती है ??

इस्मत ज़ैदी ने कहा…

यथार्थ को दर्शाती हुई कहानी जो पाठक के मन को छू जाती है

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

यह कहानी पहले पढ़ी है....ऐसी कहानियाँ बहुतों के जीवन की हैं...एक कडुआ सच है...आपकी पार्टी की साज सज्जा मन को लुभा रही है....फोटो बहुत अच्छी हैं

aruna kapoor 'jayaka' ने कहा…

ऐसे मतलबी और खुदगर्ज बेटे को क्या कहा जाए?... माता-पिता ने तो सकारात्मक पहलू पर ध्यान दे कर ही बेटे को विदेश भेजा था!... दिल को अंदर तक हिला कए रखने वाली लघु-कथा!

दिगम्बर नासवा ने कहा…

फोटो में तो जाम रहे हो भाई ... भाभी के भी दर्शन हो गये आज तो .. हमारा प्रणाम कहिएगा ....
और इस कहानी के बारे में क्या कहूँ विदेश में बैठा हूँ ... अक्सर इस सच को देखता हूँ ....

JHAROKHA ने कहा…

aadarniy sameer ji
maa ji ki idhar net par baithne ka man hi nahi karta.aaj bahut khud net par tippniya post kar rahi hun . lucknow me bijli ki beintahan aawajahi barkarar hai.kaya pata kab bijli chali jaye isliye ab muul baat par aati hun.
aapki laghu katha maine padhi aur mujhe aapki baat sahi bhi lagi kyon ki mane bhi dekhe maa baap ki aankhon me beton ke pardesh se loutane kibesabri se chahat jo jyadatar adhuuri hi rah jaati hain.
aisi baate mere dil ko bahut hi dukhati hain.aakhir aisa kyon hota hai?
yah baat yahin par chhod deti hun........|
poonam

डॉ टी एस दराल ने कहा…

अपराध बोध को न आने दें । ऐसा सब के साथ होता है । आखिर और जिम्मेदारियां भी तो हैं ।
बैकयार्ड तैयार है , पार्टियों के लिए । भई बहुत खूब । अब बस ये बताइये कि सुबह आयें या शाम को ।
कहानी हकीकत कह रही है । आजकल ऐसा ही हो रहा है । लेकिन शायद हिन्दुस्तानी पेरेंट्स के साथ । बाहर तो सुना है १८ के बाद घर से निकाल देते हैं या निकल जाते हैं ।

माधव ने कहा…

अच्छी लघु कथा
तस्वीरें तो खूबसूरत हैं ही

संजय भास्कर ने कहा…

अच्छी लघु कथा ...
तस्वीरें तो खूबसूरत हैं ही

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

कहानी नहीं यथार्थ है... आपने अच्छा इन्तजाम किया है पार्टी का... हम आते हैं सीधे कनाडा..
सरदारों की जुबान में कहा जाये तो कनैडा.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

मार्मिक कहानी । पता नहीं कितनों की साहित्य सृजन की लालसा इतिहास बन कर रह गयी है । हम भी पढ़कर ही पढ़ाते हैं ।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

मार्मिक किन्तु आज के दौर की सत्य कथा !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

dukhad prasang

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

लघु कथा तो अच्छी है ही, लेकिन मेरा मन तो बस तस्वीरों में ही रम गया....क्या सुन्दर फूलों की क्यारी है और चेरी से लदे पेड़....आप और साधना जी भी खूब जम रहे हैं :)

अजय कुमार झा ने कहा…

दिल्ली आईयेगा तो चेरिया तोडते आईयेगा ...हम आम अभिए से तोड कर रख लिए हैं ..जेतना स्पीड से आईयेगा ....ओतने ताजा स्वाद पाईयेगा । कहानी का ......का कहें ...एक दर्द है ..जिसपर गुजरती है बस वही महसूस कर पाया होगा । बकिया लिखने पढने वाला फ़ार्मूला तो अपना भी तकरीबन ओईसा ही है

shikha varshney ने कहा…

घर में मेहमान हैं थोड़ी व्यस्तता है..कहानी पढ़ने इत्मीनान से आयेंगे :)

राज भाटिय़ा ने कहा…

एक सच्ची कहानी एक नही ऎसी बहुत सी कहानिया हम ने भी देखी है, हम ने तो देखा है बेटा धीरे धीरे मां के पेसे भी बेंक से निकलवा कर ऎश कर रहा है, ओर मां को दवा भी नही दे रहा, अब क्या क्या बतलाये जी हम ने क्या क्या देखा...............

डॉ टी एस दराल ने कहा…

समीर जी , इतना अच्छा इंतजाम किया है । अब तो आना ही पड़ेगा । चलिए कल सुबह सुबह ही आते हैं आपसे मिलने ।

mehek ने कहा…

baghiche ki tasviren behad behad sunder hai,itani hariyali,mann bhar gaya.
kahani behad marmik,ek pita ki aakansha aur bete ki laparwahi wala rawaya,uska bhi ek beta hai,na jaane wo bada hokar kaisa suluk kare,aakhir insaan jo bota hai,wahi pata hai.

रंजना ने कहा…

मंथन पर पढ़ी थी यह कथा....

समय और रिश्तों के नब्ज को बखूबी टटोला और फिर प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है आपने...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

पोस्ट को साथ-साथ
लघुकथा बहुत बढ़िया है!
बधाई!

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

"""ये व्यवहार ही है जो जीवन भर साथ निभाता है"""

सौ टके की बात....आभार

योगेश शर्मा ने कहा…

Ye Happy Father's / Mother's Day generation hai jo ek din saal mein sirf ye keh ke hee santosh paa letee hai.

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

सहमत नहीं सर जी!! हमने आपको न्यौता भेजा था, वो भी एडवांस में कि हमारी चौथी माह गिरह पर आप आमंत्रित हैं, चाँद के साथ... लेकिन आप न आए… व्यस्तता के बावजूद भी, व्यस्तता के बाद भी.

सुशीला पुरी ने कहा…

समीर जी ! आपका ब्लॉग से दूर रहना खल जाता है , आपकी लघु कथा बेहद मार्मिक है . चित्र देखकर मन को तरावट मिली . दावत पर कब आयें ?

Manish ने कहा…

:) :)

pankaj mishra ने कहा…

foto bahoot acche hai, haan aap comment kate raha kareye.

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

होता है ..कई घरों में होता है...लगभग सबने यह सचाई स्वीकर कर ली है..

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

होता है ..कई घरों में होता है...लगभग सबने यह सचाई स्वीकर कर ली है..

sanu shukla ने कहा…

भाई साहब आपकी लघुकथा कमोबेश आज की सच्चाई ही प्रदर्शित करती है....बाकी ये आपके चित्र तो लज़बाव है ही ...काश अगर हमरे पास भी पंख होते तो अभी वहा आकर आपकी चेरी का जयका लेते..:-)

महफूज़ अली ने कहा…

आदरणीय समीर जी.... बिलकुल ऐसा ही मेरे साथ भी हो रहा है ..... मैं भी किसी को पढ़ नहीं पा रहा तो लिख भी नहीं पा रहा हूँ .... लघुकथा बहुत मार्मिक है.... और पढ़ कर ऐसा लगा कि कहीं तो ऐसा देखा भी है....

दीपक 'मशाल' ने कहा…

आल इन वन कहूं या आल इज वेल?? :)

Vivek Rastogi ने कहा…

पहले टिप्याने की बातें फ़िर पार्टी वो भी बेकयार्ड में ये विदेशी शब्द है, अपने यहाँ तो पीछे का आँगन कहा जाता है। और पार्टी कर लो तो बस जैसे कि कोई गुनाह कर लिया हो :)

लघुकथा के बारे में क्या कहें यही जीवन की सच्चाई है और अगले दस वर्षों में पता नहीं क्या क्या देखने को मिलेगा, लोग पैसे और प्रतिष्ठा के पीछे ही भागेंगे अपनों को छोड़कर ।

Sadhana Vaid ने कहा…

लघु कथा बहुत ही मर्मस्पर्शी है समीरजी ! माता पिता के दर्द को विदेशी जीवन शैली की सुख सुविधा, ऐशो आराम और आसानी से मिल जाने वाली धन दौलत और हर पल हर क्षण फलीभूत होती हुई महात्वाकांक्षाओं की चकाचौंध में लीन बच्चे नहीं देख पाते ! समझौता करने का दिल मसोसने वाला फ़र्ज़ भी निभाने के लिए माता पिता के हिस्से में ही आता है ! यथार्थवादी कथा के लिए आभार !
आपकी टिप्पणियों की दरकार 'उन्मना' को भी है ! आपने कई दिनों से उसे visit नहीं किया है ! समय मिले तो अवश्य देखियेगा ! उसे पाठकों तक पहुंचाने में आपकी भूमिका सदैव स्मरणीय रहेगी !
आपके बगीचे की साज सज्जा और फलों से लड़े पेड़ बहुत आकर्षित कर रहे हैं ! साधना जी तक मेरा सस्नेह अभिवादन और बधाई अवश्य पहुंचा दीजियेगा !

डा.सुभाष राय ने कहा…

प्रिय भाई समीरजी, आप के घर आने पर इतनी भीड मिलती है कि खो जाने का डर रहता है, फिर भी कभी-कभी हिम्मत कर लेता हूं. आप के बगीचे में फूल आ रहे हैं पर इधर तो इतनी गर्मी है कि फूल मुरझा रहे हैं. कहानी ठीक है, पर जैसा राय साहब ने कहा यह हर बार् नहीं होता, इसलिये इसका साधारणीकरण नहीं किया जा सकता.

unkavi ने कहा…

huzoor aapakaa bhee ehtaraam kartaa chaloo.
idhar se guzara thaa sochaa salaam kartaa chaloo.

blog par padharane evam tippani karne kaa shukriyaa.

Gaurav Sharma ने कहा…

नमस्कार समीर जी,
.
Finally, आपके ब्लॉग पर आना हुआ :)
आज तक क्यूँ नहीं आया...व्यस्तता का हवाला देना उचित नहीं है क्यूंकि जानता हूँ आप मुझसे ज्यादा व्यस्त होंगे | लेकिन लगता है कि अब थोडा सा वक़्त पढने केलिए भी निकालना ज़रूरी है | आपकी बात सौ फीसदी सही है | आज कितने ही लेखक ऐसे हैं जो अपनी टिपण्णी के साथ अपने ब्लॉग का लिंक छोड़ जाते हैं | आपकी जो बात मुझे बेहद पसंद आई वह यह की आपने बिना किसी लालच के हर किसी के ब्लॉग को पढ़ा और सराहा भी | आज से मैं आपका ब्लॉग फोलो कर रहा हूँ पर वह इसलिए नहीं की आपने हमेशा साथ बनाए रखा बलकी इसलिए की मैंने जब आज आपकी लघु कथा पढ़ी तो उसका narration देख कर हतप्रभ रह गया | यह बहुत ही उम्दा ब्लॉग है फोलो करने केलिए |
.
लघु कथा में बात जो कही गयी है वह नयी नहीं है पर कहने का अंदाज़ उसे असरदार बनाता है. एक शेर है, आपकी नजर करता हूँ.
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सिर्फ अंदाज़े बयाँ बात बदल देता है
वरना दुनिया में कोई बात नयी बात नहीं !
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कोशिश रहेगी की आपकी तरह मैं भी साथ बनाए रखूं | शुक्रिया
--गौरव

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आपका बैक यार्ड दोनों हाथ फैलाए बुला रहा है...जुलाई के प्रथम सप्ताह में अमेरिका का कार्यक्रम था लेकिन कनाडा उसमें शामिल नहीं था इसलिए उसे छोड़ दिया...आप ही बताइए कोई अमेरिका आ कर कनाडा आपसे मिलने नहीं आ पाए तो लानत है उसकी यात्रा पर...
लघु कथा मार्मिक है...हो सकता है शायद ये ही सत्य हो ...लेकिन आप बताएं हम विदेश गए बच्चों की हमेशा नकारात्मक तस्वीर ही क्यूँ सामने लाते हैं...माँ बाप को हमेशा निरीह और बच्चे, बहु को विलीन के तौर पर ही क्यूँ पेश करते हैं...??? क्या शत प्रतिशत ऐसा ही होता है...
नीरज

jamos jhalla ने कहा…

अच्छा है बहुत अच्छा है वाकई बहुत ही अच्छा है

rashmi ravija ने कहा…

कठोर सच को उजागर करती कहानी..
चेरी और फूलों की क्यारी ने तो मन मोह लिया...साधना जी बहुत ख़ूबसूरत लग रही हैं...और हाँ आप भी :)

हमारीवाणी.कॉम ने कहा…

आ गया है ब्लॉग संकलन का नया अवतार: हमारीवाणी.कॉम



हिंदी ब्लॉग लिखने वाले लेखकों के लिए खुशखबरी!

ब्लॉग जगत के लिए हमारीवाणी नाम से एकदम नया और अद्भुत ब्लॉग संकलक बनकर तैयार है। इस ब्लॉग संकलक के द्वारा हिंदी ब्लॉग लेखन को एक नई सोच के साथ प्रोत्साहित करने के योजना है। इसमें सबसे अहम् बात तो यह है की यह ब्लॉग लेखकों का अपना ब्लॉग संकलक होगा।

अधिक पढने के लिए चटका लगाएँ:
http://hamarivani.blogspot.com

adwet ने कहा…

घर घर में कहानियां हैं, हर कहानी हर पात्र की नजर से अलग ही होती है। लेखक बेचारा किसी एक की ही कह पाता है।
आपका बागीचा बहुत सुंदर है।

दिनेश शर्मा ने कहा…

बेहतरीन एवं हकीकत कहती रचना।साधुवाद!

दिनेश शर्मा ने कहा…

आज के समाज की समाज की सच्ची कहानी कहती रचना।आभार।

yehmeriduniahai ने कहा…

ये वक्त का जुगाड मात्र है...

vinay ने कहा…

सहमत हूँ,कुमार राधारमण से ।

राजेश स्वार्थी ने कहा…

लघुकथा पढ़ मन व्यथित हो गया.

साधवी ने कहा…

Backyard bahut pasand aaya. Laghu katha to aisa laga jaise ki ye kahani kitne gharon me dekhi hui hai.

amrendra "aks" ने कहा…

man ko kachotne wala ek vyangya kahu ya laghu katha kuch samj nahi aa raha !!!!!

रवीन्द्र प्रभात ने कहा…

मार्मिक किन्तु सत्य !

डॉ० डंडा लखनवी ने कहा…

भाई समीर जी।
अधिकांश ब्लागों पर आपकी सटीक टिप्पणियों को पढ़ कर आपकी सक्रियता को नमन करता हूँ। चिठ्ठा जगत और चिठ्ठाकारों की प्रवृत्तियों पर आपका चिंतन प्रभावकारी है। आपके आवास के पीछे नयनाभिराम बाटिका के चित्र बडे सजीव हैं जिन्हें देख कर बागों के शहरवासी का दिल बाग-बाग हो उठा। लधुकथा किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को मूल्यों मे हो रहे क्षरण के प्रति चिंतन करने पर विवश कराती है। यही कथाकार की सफलता है।
इस संबध में आपको एक मनोवैज्ञानिक की बात बताता हूँ। जिस बात को हम बार-बार दोहराते हैं। वह हमारे मन-मस्तिष्क में गहरे पैठ जाती है और उसी ओर हम अभिप्रेरित होते रहते हैं। "शीलों" के संबंध में भी यही बात लागू होती है। आज हमारे पास कोई निर्विकार एवं प्रभावकारी एजेन्सी नहीं है जो सामाजिकों के शील-संयमन की सधाना करा सके। इसके विपरीत अश्लीलता को दावत देने वाले विज्ञापनों का पहाड़ा हम सब दिन भर पढ़ते हैं। फलस्वरूप लोग अश्लील आचरण सहज ही करने लगते हैं। जिस समाज से व्यक्ति को जीवन-ऊर्जा मिली होती है उसी के प्रति अपने उत्तरदायित्वों से वह मुख मोड़ लेता है। ग्रहस्थों के लिए निर्धारित पाँच शीलों का पालन हमारे समाज में कभी अनिवार्य था। अब वह व्यवस्था छिन्न- भिन्न हो गयी है। बुढ़ापे में माता-पिता को सहारा न देना अश्लीलता है। समाज में रोग कुछ होता है और उपचार हम कुछ करते हैं।
सद्भावी - डॉ० डंडा लखनवी

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ab inconvenienti ने कहा…

यह संस्कारों का क्षरण है, एकदम से तो हुआ नहीं है.

DEEPAK BABA ने कहा…

दादा, राम राम. ज्यादा गहेराई में तो नहीं जा रहा पर ब्लॉग में लगी फोटू बढ़िया है. बेक यार्ड क्या है - मेरे जैसे के लिया तो स्वर्ग है. अपने मन की सभी कुछ कर लें.

शरद कोकास ने कहा…

मैं भी सोच रहा हूँ कि आज कुछ छूटी हुई पोस्ट पढ़ लूँ ।
तभी आपसे कुछ कहने का हक़ बनेगा ।
कहानी बहुत मार्मिक है ,मैने अपनी बैंक की नौकरी के दौरान इसे घटित होते हुए देखा है ।