रविवार, मई 02, 2010

मजदूर दिवस के मजबूर

मजदूर दिवस पर भाषण देने दिल्ली से नेता जी गांव आये.
मजदूरों के वर्तमान हालात और उसके सुधार एवं मजदूरों के उत्थान के लिए सरकार की भावी योजनाओं पर खुल कर बोले और वापस चले गये.
नन्दु और उसके दो भाई, जिन्होंने तीन दिन रात लग कर सभा स्थल पर मंच का निर्माण किया था, अपनी पेमेन्ट के लिए न जाने कब से भटक रहे हैं.

 

Moon

१.

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!

hammer

२.

थकान से चूर बदन
कांपते हुए हाथ
माथे से बहती पसीने की धार
और उसने फिर से किया
भारी भरकम हथोड़े से
छैनी पर प्रहार....
बार बार

छन्न्न्न्न्न्न!
छान्न्न्नन्न
छंन्न्न्न

एक पल के लिए
जैसे ही यह लय टूटी

उसे सुनाई दी
घर में इन्तजार करते
बेटे की आवाज

बापू!! रोटी!!!!!!!!

भूल कर अपनी थकान
वो फिर तैयार हुआ
अगला प्रहार
करने के लिए
क्यूँकि
असमर्थ था वह
इस आवाहन को
नकारने में …

-समीर लाल ’समीर’-     

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88 टिप्‍पणियां:

वाणी गीत ने कहा…

चाँद कवि को महबूबा और गरीब को रोटी सा लगता है ..
घर की रोटी की फिक्र मजदूर को थकने नहीं देती ...
मजदूर सिर्फ छेनी हथौड़ी वाले ही नहीं होते ....

मो सम कौन ? ने कहा…

अब साहब, ये मज़दूर दिवस तो हर साल मनाया जाना है। मज़दूर रहेंगे तभी तो ऐसे आयोजन हो पायेंगे। और फ़िर नन्दू जैसों के लिये ये कोई नई बात नहीं है, उनको तो आदत है ही, काहे को आदत बिगाड़नी।
कवितायें भी बहुत अच्छी लगीं।
आभार।

honesty project democracy ने कहा…

मजदूरों की दयनीय अवस्था को देख कर तो यही कह सकते हैं--यहाँ सब कुछ बनावटी और दिखावटी है, चाहे मुख्यमंत्री हो या परिवहन मंत्री / भ्रष्टाचार और मंत्रियों में पूरा-पूरा और खुलेआम संतुलन है / ऐसे में पैसे की तंगी ना बाबा ना !!!! माका नाका--------? अच्छी प्रस्तुती के लिए आपका धन्यवाद /

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

जिन्होंने दुनिया को सब कुछ दिया, दुनिया के पास उन्हें देने के लिये कुछ भी नहीं...

श्यामल सुमन ने कहा…

संवेदना को जगाने वाली पोस्ट समीर भाई। दुनिया के हर "मजे से जो दूर है उसे मजदूर" कहते हैं और उनकी जीवनी कुछ यूँ चलती है कि-

खाकर के सूखी रोटी लहू बूँद भर बना
फिर से लहू जला के रोटी जुटाते हैं

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

M VERMA ने कहा…

क्यूँकि
असमर्थ था वह
इस आवाहन को
नकारने में …
और फिर यही असमर्थता न जाने कितने अनचाहे और अनिच्छित कार्य करने को मजबूर कर देती है, न केवल मजदूर बल्कि सभी को ---- (उस वर्ग ??? को छोड़कर)

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

ek katu sachchaai.

Arvind Mishra ने कहा…

बस केवल एक शब्द और भाव -मार्मिक !

ललित शर्मा ने कहा…

एक मजदूर का दर्द उड़ेल दिया कविता में आपने।

JHAROKHA ने कहा…

bahut hi gahari baat kahi hai aapne. hridaya ko chhoone wali marmsparshi rachna.bahut hi sundar bhav.
poonam

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

आप संवेदना के उच्चतम स्तर तक पहुँच जाते हैं।

अजय कुमार ने कहा…

मजदूर की व्यथा ,दर्द और मजबूरी सब कुछ बयां कर दिया आपने ।

ओम आर्य ने कहा…

'रात ने अपनी थाली में चाँद परोसा लगता है'

अच्छी लघुकथा.

नरेश सिह राठौङ ने कहा…

बहुत सुन्दर बात कही है | कवी और मजदूर की सोच अलग तो होती है | मैंने एक बात और भी नोट की है कि खाने पीने का स्तर सबसे ज्यादा अच्छा या तो अमीर लोगो का है या बिलकुल गरीब का है | मजदूर ज्यादातर चिकन और शराब के बिना नहीं चल सकते है |

अजित वडनेरकर ने कहा…

मजदूर को सलाम। आपकी संवेदना को सलाम।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपके शब्द-चित्र बहुत हृदयस्पर्शी हैं!

संगीता पुरी ने कहा…

दिल्ली से नेता जी गांव आकर मजदूरों के वर्तमान हालात और उसके सुधारऔर सरकार की भावी योजनाओं पर खुल कर बोले..नन्दु और उसके दो भाई अपनी पेमेन्ट के लिए न जाने कब से भटक रहे हैं.
सटीक !!

राम त्यागी ने कहा…

कड़ी मेहनत से वो पैसे कमा रहा है और रात में चैन की नीद सोयेगा...मंच से भासढ़ देने वाला सब कुछ होते हुए भी टेंशन में मरता रहेगा, जलाता रहेगा . कविता में कुछ पक्तियां बहुत भावपूर्ण !

अमिताभ मीत ने कहा…

क्या बात है भाई ... कमाल की पोस्ट.

गिरिजेश राव ने कहा…

नई कविता आन्दोलन के समय सम्भवत: सर्वेश्वर ने चाँद को रोटी से जोड़ती एक कविता रची थी ।
'आह्वान' का 'आवाहन' रूप अच्छा लगा। पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के वहन का आह्वान।

तीन की जगह छ: दिन दिखाते मस्टर पर अंगूठा लगा दें तो मजदूरी के साथ एक अध्धा कम्प्लीमेंट्री।... नन्दू को बताया जाय।

रंजन ने कहा…

दोनों बेहद प्यारी.

विनोद कुमार पांडेय ने कहा…

भूल कर अपनी थकान
वो फिर तैयार हुआ
अगला प्रहार
करने के लिए
क्यूँकि
असमर्थ था वह
इस आवाहन को
नकारने में

समीर जी, मजदूर दिवस पर एक बेहतरीन रचना..और बहुत सुंदर भाव...सशक्त रचना के लिए धन्यवाद

खुशदीप सहगल ने कहा…

सूरज ज़रा, आ पास आ,
आज सपनों की रोटी पकाएंगे हम,
ए आसमां तू बड़ा मेहरबां,
आज तुझको भी दावत खिलाएंगे हम,
सूरज ज़रा, आ पास आ...
 
चूल्हा है ठंडा पड़ा,
और पेट में आग़ है,
गर्मागर्म रोटियां,
कितना हसीं ख्वाब है,
सूरज ज़रा, आ पास आ,
आज सपनों की रोटी पकाएंगे हम,
ए आसमां तू बड़ा मेहरबां,
आज तुझको भी दावत खिलाएंगे हम,
सूरज ज़रा, आ पास आ,

आलू टमाटर का साग,
इमली की चटनी बने,
रोटी करारी सिके,
घी उसमें असली लगे,
सूरज ज़रा, आ पास आ,
आज सपनों की रोटी पकाएंगे हम,
ए आसमां तू बड़ा मेहरबां,
आज तुझको भी दावत खिलाएंगे हम,
सूरज ज़रा, आ पास आ...

जय हिंद...
 

Ratan Singh Shekhawat ने कहा…

मजदूरों के भी दिन फिर रहे है वो दिन दूर नहीं जब काम करने के लिए लोग मजदूरों के आगे पीछे घुमंगे | गांवों में तो इसकी शुरुआत भी हो चुकी है | मनरेगा जैसी योजनाएं चलती रही तो मजदुर खोजे भी नहीं मिलेंगे |

seema gupta ने कहा…

और

मजदूर
को
रोटी!!!

" सच में कितना फर्क है चाँद की देखने का भी.......बेहद सम्वेदनशील.....अभिव्यक्ति.."
regards

kshama ने कहा…

Bahut sanvedansheel rachana..Nandu jaise aur na jane kitne honge jo apni haqki mazdoori ke liyebhi taras jate hai!

SANJEEV RANA ने कहा…

थकान से चूर बदन
कांपते हुए हाथ
माथे से बहती पसीने की धार
और उसने फिर से किया
भारी भरकम हथोड़े से
छैनी पर प्रहार....
बार बार

छन्न्न्न्न्न्न!
छान्न्न्नन्न

bahut hi marmspashi baat dekhte sab h samjhta koi koi hain .
ye india h ji
"mahngai ko kam kaise kiya jaye iski meeting aur charcha me 1 lakh rupaiya kharch ho gya "
aisa haal h desh ka

ali ने कहा…

दूसरी बेहतर है !

dhiru singh {धीरू सिंह} ने कहा…

bahut sunder

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वह ग्रेनाइट बनाने के लिये चट्टान तोड़ रहा है । वही ग्रेनाइट जो हमारे ड्रॉइंग रूमों में लगता है । छन्न्न्न ।

ताऊ रामपुरिया ने कहा…

बिल्कुल सटीक और मार्मिक. मजदूरों की मेहनत पर पानी फ़ेरकर ताऊ लोग चांद में महबूबा तलाशते हैं. अगर खुद मजदूरी करें तो ,आलूम पडे कि महबूबा असल में कहां मिलती है?

रामराम

Shekhar Kumawat ने कहा…

BAHUT KHUB

BADHAI AAP KO IS KE LIYE

Manish ने कहा…

चाँद
को
देखकर
कवि को
याद आती है
**अपनी महबूबा**
और
मजदूर को
रोटी!!!


गिरते हुए को संभाल लिया आपने..... रात में लाइब्रेरी का उपयोग होने के कारण... आसमान में चाँद ही दिखता था... और हम ठहरे मूरख.... उन्हें चाँद के चमकने की intensity और तारों की light frequency बताया करते थे.... कि मौसम कितना सुहावना हैं...... रात कितनी लुभावनी हैं..... पता नहीं वो क्या समझते रहे.... राम राम !!
अब तो चाँद को गरीब की रोटी समझ कर explain किया करेंगे...
कम् से कम् दूसरे को दूसरा पहलू तो पता चले.....

रश्मि प्रभा... ने कहा…

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!
yahi hai satya

कुमार राधारमण ने कहा…

आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी रोटी को मोहताज लोग। असली गरीबी यही है कि आज का जुगाड़ होने पर भी कल के लिए निश्चिंतता न रहे।

sangeeta swarup ने कहा…

छैनी हथोऔदे के रूपक लेकर हर मजदूर कि मजबूरी कह दी है.....संवेदनशील रचना...

सुलभ § सतरंगी ने कहा…

अति संवेदनशील पंक्तिया है.

वैसे मजदूर और मजदूरों का दायरा भी छेनी-हथौरी से आगे बढ़ गया है.

सुशीला पुरी ने कहा…

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!
----------अप्रतिम !!!!!!

संजय बेंगाणी ने कहा…

चाँद को देख कर हमें ऐसा बल्ब याद आता है जो पर्यावरण को नुकसान नहीं पहूँचाता और जिससे मुफ्त में रोशनी मिलती है.

शेष आपने मजदूरों के हालात पर मार्मिक कविता की है.

rashmi ravija ने कहा…

उसे सुनाई दी
घर में इन्तजार करते
बेटे की आवाज
बापू!! रोटी!!!!!!!!
बहुत ही मार्मिक चित्रण...एक मजदूर की मजबूरियों का

रचना दीक्षित ने कहा…

बहुत जबरदस्त अभिव्यक्ति

शशांक शुक्ला ने कहा…

बस यही कि मजबूर दिवस की शुभकामनाएं

राज भाटिय़ा ने कहा…

नन्दु और उसके दो भाई.... आज हर तरफ़ दिखते है, जिस दिन नन्दु और उसके दो भाई जेसे लोगो को अक्ल आ जाये जी उस दिन इन नेताओ की अक्ल टिकाने लग जाये गी

'उदय' ने कहा…

.... रचनाएं प्रसंशनीय !!!

अभिषेक ओझा ने कहा…

निशब्द हो जाता हूँ ऐसी पोस्ट्स पर !

अमरेन्द्र नाथ त्रिपाठी ने कहा…

छन्न्न्न्न्न्न!
छान्न्न्नन्न
छंन्न्न्न

Amit Sharma ने कहा…

मनरेगा जैसी योजनाएं चलती रही तो मजदुर खोजे भी नहीं मिलेंगे |

shikha varshney ने कहा…

बेहद संवेदनशील रचना ..

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

मजदूर की थकान आपके इन लफ़्ज़ों में बखूबी उतरी है ..

Babli ने कहा…

बहुत ही खूबसूरती से आपने हर एक शब्द लिखा है! प्रशंग्सनीय रचना!

अनामिका की सदाये...... ने कहा…

uffff kitna dard samait diya 2 shabdo ne hi 'BAAPPU ROTI'
lekhak man ki samvedansheelta ujagar hoti hai.

Mahfooz Ali ने कहा…

पहली कविता ने ही दिल को छु लिया.... बहुत संवेदनात्मक पोस्ट...

--
www.lekhnee.blogspot.com


Regards...


Mahfooz..

SAMVEDANA KE SWAR ने कहा…

अपनी पेमेंट का इंतेज़ार करने वाला, चाँद में रोटी का अक्स देखने वाला और हथौड़े की आवाज़ के पीछे बच्चों की पुकार सुनने वाले मज़दूर की सच्ची तस्वीर रखी है आपने... बकौल राजेश रेड्डीः
उसने जिस हाथ से तामीर किया ताजमहल
रख दिया वक़्त ने उस हाथ को छोटा करके.

डॉ टी एस दराल ने कहा…

मार्मिक ।
कम शब्दों में बहुत कुछ कह दिया ।
अति संवेदनशील ।

देव कुमार झा ने कहा…

बहुत सटीक
वैचारिक मंथन और सत्य बयान करती हुई कविताएं..

Mithilesh dubey ने कहा…

सच्चाई समेटे लाजवाब रचना लगी , कविता बहुत पसंद आई ।

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

ओहो...चांद में रोटी...
अच्छा लगा...

nilesh mathur ने कहा…

कमाल करते हैं भैया आप भी, काहे बार बार अन्दर तक झकझोर देते हैं!

अजय कुमार झा ने कहा…

सशक्त रचना , और बहुत कुछ कहने वाली ॥

mukti ने कहा…

हाँ, मजदूर तो हम सभी हैं, पर असंगठित क्षेत्र के मजदूर अधिक शोषित हैं. आपकी संवेदना उन्हें छूती है.

सुमन'मीत' ने कहा…

सच कहा है सभी का अपना अपना दायरा है ।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

नमन आपको और आपकी लेखनी को !!

हिमांशु पन्त ने कहा…

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!


वाह क्या कहने, बेहद खूबसूरत पंक्तियाँ.. बहुत खूबसूरती से आपने चाँद की दो परिभाषा दे दी सर और क्या उम्दा सोच के साथ, हमारी खोपड़ी तो वहां तक पहुँचने की सोच भी नहीं सकती .. जहाँपनाह तुस्सी ग्रेट हो..

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सशक्त अभिव्यक्ति।

विवेक श्री ने कहा…

अच्छा है..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

आप जो बात हाथ में कलम लेकर लिख दिए, ओही बात बेचारा मजदूर हथौड़ा से छन्न्न्न्न्न्न्न करला के बादो पत्थर का ऊपर नहीं लिख पाता है... उसका त हाथ का लकीर भी धोखा है, अऊर पत्थर का लकीर भी... एक दम करेजा चीरने वाला बात लिखे हैं.

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" ने कहा…

हमारे पेट भरे हुए हैं इसलिए हम साहित्य चिंतन कर पाते हैं, सही गलत के बारे में सोचते हैं ... जहाँ पेटभर खाना ही नसीब नहीं होता है ... वहां साहित्य क्या, और जज़्बात क्या ... वहां सिर्फ एक ही बात महत्वा रखती है .. वो है 'पेट कैसे भरा जाये' ... नेताजी गरीब के हक की बात करते हैं ... पर जब उनका अपना कहीं घर बनता होता है ... तो गरीबों को सरकारी रेट से पैसा मिलता नहीं है ...

Gourav Agrawal ने कहा…

बहुत सुन्दर बात कही है |

राजेश स्वार्थी ने कहा…

सशक्त रचनायें. आपको बधाई.

संजय तिवारी ’संजू’ ने कहा…

बहुत गजब. चांद और रोटी-क्या बात है.

महावीर ने कहा…

बड़ी संवेदनशील किन्तु कटु सत्य है.

चाँद
को
देखकर

कवि
को
याद आती है
अपनी महबूबा

और

मजदूर
को
रोटी!!!
भूल कर अपनी थकान
वो फिर तैयार हुआ
अगला प्रहार
करने के लिए
क्यूँकि
असमर्थ था वह
इस आवाहन को
नकारने में …
बहुत सुन्दर!
महावीर शर्मा

सतीश सक्सेना ने कहा…

वाह समीर भाई !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बहुत बढ़िया!

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लाजवाब रचना...हमेशा की तरह...वाह
नीरज

नीरज गोस्वामी ने कहा…

लाजवाब रचना...हमेशा की तरह...वाह
नीरज

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ ने कहा…

सत्य वचन।

राजेश उत्‍साही ने कहा…

समीर जी कवि भी चांद को देखकर रोटी की ही याद करता है। पर अंतर केवल यह है कि वह उसे रोटी नहीं कहता,महबूबा कहता है। भला कवि का पेट भी तो रोटी ही भरती है।
तो केवल नजरिए का फर्क है।

राजेन्द्र मीणा 'नटखट' ने कहा…

sundar..maarmik


http://athaah.blogspot.com/

गुस्ताख़ मंजीत ने कहा…

वह सड़क पर गिरा था, और भूख से मरा था, कपड़ा उठा के देखा तो पेट पर लिखा था, सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा

साधवी ने कहा…

आपकी रचना पढ़कर उबरने में बहुत समय लगता है. बहुत अच्छी रचना.

Laxmi N. Gupta ने कहा…

बिलकुल उपयुक्त कविता है और चित्र भी, मज़दूर दिवस पर। बधाई।

बवाल ने कहा…

ऐसा तो हमारे प्यारे लालाजी ही कह सकते हैं। हमेशा की तरह दिल को छूती हुई पोस्ट।

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

मर्मस्पर्शी कविता।
धन्यवाद।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

मजदूर दिवस पर इससे ज़्यादा संवेदनाएँ मजदूरों के प्रति क्या हो सकती हैं .... सच लिखा है .... अक्सर ऊँची ऊँची इमारत पर बैठे लोग इन मजदूरों के बारे में नही सोचते ....

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।
इसे 08.05.10 की चिट्ठा चर्चा (सुबह 06 बजे) में शामिल किया गया है।
http://chitthacharcha.blogspot.com/

VerAsh ने कहा…

Sari bate sahi hai but hum in samsayo ko door karne ke liye kya kar rahe hain??

Yashwant Yash ने कहा…

कल 02/05/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
धन्यवाद !

कविता रावत ने कहा…

सार्थक प्रस्तुति!