मेरे घर के बाजू में मोड़ पर एक जंगल रहता है. जबसे इस घर में आया हूँ, तबसे उसे देखता आ रहा हूँ. उसे न कहीं आना और न कहीं जाना.
तरह तरह के पेड़ हैं. मौसम के हिसाब से पत्तियाँ रंग बदलती रहती है. हरे से लाल, फिर पीली और भूरी होकर पेड़ों का साथ छोड़ देती है बरफ गिरने से थोड़ा पहले.
बर्फिली आँधियों में जब पेड़ों को सबसे ज्यादा उनके साथ की जरुरत होती है , तब वो पत्तियाँ उनके साथ नहीं होती.
पेड़ अकेले अपने नंगे बदन पर मौसम की मार झेलते रहते है, कड़कड़ाती ठंड भर. सब तरफ सन्नाटा और अपने आपको, अपने अस्तित्व को बचाते, चुभती सर्दी की मार झेलते वो पेड़.
मगर दिन तो एक से नहीं रहते हमेशा. हर दुख के बाद एक सुख आता है.
ठंड भी बीत जाती है और आता है सुहाना मौसम, फिर गुनगुनी गरमी.
अच्छे वक्त में वो पत्ते भी वापस आ जाते हैं और वो पेड़, फिर उसी तरह स्वागत करते हैं उन पत्तियों का. उनके साथ हँसते है, खिलखिलाते है, खुश होते है. चिड़ियों के मधुर संगीत को सुनते हैं.
जानते है कि फिर सब चले जायेंगे मुसीबत में साथ छोड़ कर लेकिन उसके लिए क्या आज का खुशनुमा पल और साथ भी गँवा दें.
नहीं!! जितने दिन की भी हो, वे उस खुशी को भरपूर जीना जानते है और शायद यही खुशी और इसका इन्तजार उन्हें मुसीबत के दिनों में बर्फिली आँधी को झेल जाने की ताकत देता है.
प्रकृति के नियम और स्वभाव तो सब ही के लिए एक से हैं. फिर हम क्यूँ किसी और के व्यवहार के चलते अपने खुशी के समय को भी खराब कर लेते हैं.
जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!
-
एक लहर आती है, एक लहर जाती है,
आपस में मिल कर खुशियाँ मनाती है
-आज फिर उनसे मुलाकात होने को है.
-समीर लाल ’समीर’






























94 टिप्पणियाँ:
Aapki soch ki daad deni hogi sameer sir, abhivaadan..
Jai Hind...
कल क्या होगा, किसको पता
अभी ज़िंदगी का ले ले मज़ा...
गुरुदेव, बड़ा गूढ़ दर्शन दे दिया....क्या ये पेड़ उन मां-बाप के बिम्ब नहीं है जिनके बच्चे दूर कहीं बसेरा बना लेते हैं....साल-दो साल में एक बार घर लौटते हैं तो मां-बाप उन पलों को भरपूर जी लेना चाहते हैं,,,,
जय हिंद...
आज उनसे मुलाकात होगी..
ढेर सारी फिर बात होगी..
कल होगा क्या .....क्या पता क्या खबर ...
हंस ले, गा ले, जी लें सारे .....जीवन में सुख-दुःख के दो ही किनारे.....
बहुत सुन्दर बात कह दी आपने.....हमेशा की तरह....
बहुत सही पकड़ा खुशदीप...यही तो वजह है कि तुम... :)
Chalo Phir kal milte hain. AAs par to duniya kayam hai. ane wale kal ke har pal ke liye shubhkamaon ke saath
ssneh
Devi Nangrani
वाह समीर जी आपने बड़े ही खूबसूरती से ज़िन्दगी की सच्चाई को पेश किया है जो मुझे बेहद पसंद आया! ये बात आपने बिल्कुल सही कहा है कि क्या पता-कल हो न हो!! आखिर ज़िन्दगी का क्या भरोसा, मैं आज खुश रहने के बजाय दुखी हूँ और शायद कल इस दुनिया में न रहूँ ! मेरा तो ये मानना है कि दुःख और सुख लेकर ही इंसान जीते हैं पर दुखों को भूलकर हमेशा हँसते रहना और सबके साथ खुशियाँ बाँटने में जो आनंद प्राप्त होता है उससे बढ़कर कुछ भी नहीं!
अरे वाह....!
समीर भाई!
पृक्रति को लेकर लघु-कथा अच्छी बन पड़ी है।
बुरे वक्त में अपना साया भी बेगाना होता है।
बहुत-बहुत बधाई!
मुझे पता है कि आप मेरी टिप्पनी अप्रूव नहीं करेंग फिर भी...
यह जीवन दर्शन बहुत अच्छा लगा, बताने से अपने को नहीं रोक पा रहा हुं.
बहुत सुन्दर दर्शन!
घुघूती बासूती
प्रकृति के नियम और स्वभाव तो सब ही के लिए एक से हैं. फिर हम क्यूँ किसी और के व्यवहार के चलते अपने खुशी के समय को भी खराब कर लेते हैं.
" बेहद प्रभावी संदेश व्यक्त करती पंक्तियाँ"
regards
जानते है कि फिर सब चले जायेंगे मुसीबत में साथ छोड़ कर लेकिन उसके लिए क्या आज का खुशनुमा पल और साथ भी गँवा दें. नहीं!
वाह समीर जी, आपकी प्रखर दृष्टि का कायल हो गया हूँ.....
जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!
बेहतरीन सन्देश ...शुभ हो ...!!
कथा बेशक लघु हो पर इसमें सीख बहुत बड़ी है |
आजकल आप ज्यादा ही गंभीर होते जा रहे हैं.
खुशी को लपक लेने में भी समझदारी है..पता नहीं वक्त क्या करवट ले ले...हम ही कल हों ना हों
असली बिना मिलावट वाला जीवन दर्शन एक पेंड से ही सीखा दिया आपने तो .
wakai kitane samvedanshil insaan hain aap... aap jitane hasmukh aur majaakiyaa likhte hain usase kahi jyada prabhavshaali lekhan aap tab ho jaati hai jab aap gambhir vishay ko apne sundar shabdon se piro dete hain... yah laghu katha iskaa parichayak hai... bahut hi gambhir baat kahi hai aapne... guru ji ke blog pe nagraani ji dwara aapke bikhare moti ki samikshaa kya khub hai...badhaayee fir se
arsh
यह बात यदि व्यक्ति सदैव याद रखे तो फिर मुझे नहीं लगता की दुनिया में कोई किसीसे वैर पालेगा....
बहुत ही सही कहा आपने...हमेशा याद रखने लायक बहुत ही कल्याणकारी बात...
ढेर सारे गीत याद आये अंकल
आगे भी जाने ना तू, पीछे भी जाने ना तू
जो भी है बस यही एक पल है
यह ओल्ड था
एक नया भी है 'वांटेड' का
ले ले ले ले ले ले मज़ा रे... !!!! :)
nice lesson.
हाय ! सलमान का ठुमका... दुःख भरी जिंदगी में मुस्कान...
"जीने के हैं चार दिन, बांकी हैं बेकार दिन..."
एक लहर आती है, एक लहर जाती है,
आपस में मिल कर खुशियाँ मनाती है
-आज फिर उनसे मुलाकात होने को है....
क्या पाता कल हो ना हो, बहुत बढिया
कुदरत तो बहुत कुछ कहती है समीर जी हम समझने को तैयार नहीं। बुरे वक्त पर पत्ते छोड़कर चले जाते हैं, लेकिन फिर भी रुख उनके वापिस आने पर उनका स्वागत करते हैं। वो नाराज नहीं होता कि बुरे वक्त क्यों छोड़कर चले गए। शायद मानव से पेड़ ज्यादा समझदार है। जो दुख हमारे लिए बने हैं, उनमें किसी और को झेलने के लिए क्यों रखा जाए।
शब्द लापता हैं
DARSHNIK LAGHUKATHA, apni samajh se baahar......fir-fir-fir padhna padhega.
(aakhir aapke jaisii shabdawali aur soch tak abhi pahunche nahin hain.)
पतझड के बाद तो वसंत को आना ही है। मायूस होने से क्या लाभ! जीवन भी तो एक बाज़ी ही है...
बाज़ी किसी ने जीती या हार दी
जैसे मिली - शबेगम गुज़ार दी
बहुत सुन्दर बात कह दी आपने
आज बहुत ख़ुश हूं
पता नहीं कल रहूं न रहूं
बहुत उमदा समीरजी।
आजकल आप ज्यादा ही गंभीर होते जा रहे हैं.
ढेर सारी शुभकामनायें.
SANJAY KUMAR
HARYANA
http://sanjaybhaskar.blogspot.com
ज़िन्दगी का एक मानीखेज़ फ़लसफा़ !!! मगर यह भी सच्चाई है कि और भी ग़म हैं ज़माने में...............
प्रमोद ताम्बट
भोपाल
www.vyangya.blog.co.in
दरख्तों पे अब नए पत्ते नज़र आने लगे हैं
दिए थे जो जख्म पतझर ने,अब मुस्कुराने लगे हैं.....सुन्दर रचना
वाह...आपने बहुत सच्ची और अच्छी बात की है...आपके अपने निराले अंदाज़ में जिसका पूरा ब्लॉग जगत दीवाना है...लिखते रहें यूँ ही...
नीरज
आपकी पोस्ट जैसा ही अपना शेर सुनाता हूँ:-
जब तलक जीना है "नीरज" मुस्कुराते ही रहो
क्या ख़बर हिस्से में अब कितनी बची है जिन्दगी
जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो........
KYA KAAT HAI SAMEER BHAI ... SACH HAI KAL KISNE DEKHA ... JO HAI BAS AAJ, ISI PAL MEKIN HAI ... "AANE VAALA PAL, JAANE WAALA HAI ..."
waqt ke saath badalte hain mausam aur har ek shah
prakriti isiliye to nit yovna hoti hai ki wah pratipal badalti hai purana tut ke bikharta hai naya apna sthan leta hai
apne ise sunder shabdon main dhala
bahut achchha laga
ज़िन्दगी का फलसफा लिख दिया है आपने समीर जी ..यह बात आज हर इंसान समझ जाए तो दुःख इतना सताए क्यों ...पर फिर भी दिल है न आसानी से मानता नहीं ...अच्छी लगी आपकी यह लघुकथा ..
बहुत सही पकड़ा खुशदीप...यही तो वजह है कि तुम... :) लघु कथा का मामला तो खुशदीप ने पकड़ लिया लेकिन ये यहां पर तुम और स्माइली के बीच क्या है इसे कौन पकड़ेगा?
एक प्राकृतिक लघु कथा।
जीवन का दर्शन है इस लेख में , वाकई हमें जीवन के
हर पल का आनंद लेना चाहिए
बहुत सार्थक और उपयोगी मर्म है कथा का। आभार।
--------
बहुत घातक है प्रेमचन्द्र का मंत्र।
हिन्दी ब्लॉगर्स अवार्ड-नॉमिनेशन खुला है।
जीवन की सचाई बता दी आपने ! अब की बार कुछ हलके मूड का हो जाये, सर जी !
सही है समीरजी यही जीवन है की आज को भरपूर जियो !!! वर्तमान को आनदमय बनाओ !!!
Badee khoobsooratee se manavi man chitran kiya hai...ham yaa to anagat ki chinta karte hain, ya vigat me jeete hai...manko ek anirbandh bandar bana lete hain...
chitr bhi behad sundar hain..
yeh laghu katha bahut achchi lagi....
प्रकृति के नियम और स्वभाव तो सब ही के लिए एक से हैं. फिर हम क्यूँ किसी और के व्यवहार के चलते अपने खुशी के समय को भी खराब कर लेते हैं.
जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!
yeh panktiyan bahut sunder lagin....
behtareen sandesh ke saath ...bahut hi sunder rachna....
saadar
mahfooz...
इससे बड़ा सच और कुछ नही है,हम भी प्रकृति से यही सीख रहे हैं।दिल को छू गई ये पोस्ट्।
कभी कभी अपनों का धीरे से मारा हुआ मुक्का भी जोर से लग जाता है। विशेष कर ऐसे समय के लिए आपका यह प्रवचन याद करने योग्य है।
Bahut sundar...ham aksar wartmaan ko chhod yaa anagat kee chinta karte hain, manko manko bandar kee tarah daudake, vigat kee tahniyon pe jhoomte hai..
Chitr bhi behad sundar!
वाह ,
ऎसा भी तो है हर सुख के बाद दुख दस्तक देता है
प्रकृति के नियम और स्वभाव तो सब ही के लिए एक से हैं. फिर हम क्यूँ किसी और के व्यवहार के चलते अपने खुशी के समय को भी खराब कर लेते हैं.
इसीलिये शंकराचार्य ने कहा है " भज गोविंदम..भज गोविंदम मूढमते..
इसीलिये किनारे लगना ही एक मात्र उपाय है.
रामराम.
रहिमन चुप ह्वै बैठिये देख दिनन के फेर।
जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहैं देर॥
सही कहा आपने.. "जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!
जय हो..
समीर भाई
"शिद्दत से महसूस करना और फिर उतनी ही खूबसूरती से उकेर देना हर किसी के वश की बात नहीं"
अनंत शुभकामनायें !
"बर्फिली आँधियों में जब पेड़ों को सबसे ज्यादा उनके साथ की जरुरत होती है , तब वो पत्तियाँ उनके साथ नहीं होती"
यह वाक्य काव्यात्मक हो सकता है लेकिन सत्य नही है। पत्तियां जल वाष्पित करती हैं। बर्फीले मौसम में नमी की कमी हो जाती है। वातावरण हर वस्तु की नमी को सोखने लगता है। तब पेड़ पत्तियाँ गिरा देते हैं, जिन से उन के भीतर की नमी बनी रहे। बर्फ का असर उन पर कम से कम हो। यदि उस मौसम में पत्तियाँ बनी रहें तो पेड़ मर जाए, अगला वसंत न देख पाए।
" जानते है कि फिर सब चले जायेंगे मुसीबत में साथ छोड़ कर लेकिन उसके लिए क्या आज का खुशनुमा पल और साथ भी गँवा दें. नहीं!! "
सच कहा है । बहुत ही भावपूर्ण लेख है ।
Umda rachna, sab jaante hai magar aapki tarah vyakt nahi kar paate. yahi niyati ka khel hai. isiliye shastro me pedh ko bhi guru mana gaya hai.
सहजता से गूढ़ को भी सहज बना कर प्रस्तुत करना आपसे सीखा जा सकता है ।
लघुकथा शानदार है ।
very nice....ek laghu katha kaaphi achchi lagi....thanks for posting.....
very nice....ek laghu katha kaaphi achchi lagi....thanks for posting.....
फिर हम क्यूँ किसी और के व्यवहार के चलते अपने खुशी के समय को भी खराब कर लेते हैं.
जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!
बहुत बढ़िया मनोभाव उम्दा पोस्ट. आभार.
कल को खुशगवार बनाने की चिन्ता में आज को तनाव और चिन्ता में काट देना कत्तई बुद्धिमानी नहीं है। लेकिन अपने आज को इस प्रकार सुव्यवस्थित और सदुपयोग से परिपूर्ण बनाना ही ठीक है कि उसपर कल का सबेरा सुन्दर रूप में आ सके। द्विवेदी जी ने प्रकृति की व्यवस्था का सुन्दर विश्लेषण करके यही बात सिद्ध की है।
वर्तमान और भविष्य का सुन्दर सामन्जस्य ही स्वर्णिम मध्यमार्ग की ओर ले जाता है।
एक सुन्दर भावप्रवण पोस्ट हेतु धन्यवाद।
लघुकथा अपनी संक्षिप्तता, सूक्ष्मता एवं सांकेतिकता में जीवन की व्याख्या को नहीं वरन् व्यंजना को समेट कर चली है। बहुत अच्छी लगी।
प्रकृति के नियम और स्वभाव तो सब ही के लिए एक से हैं. फिर हम क्यूँ किसी और के व्यवहार के चलते अपने खुशी के समय को भी खराब कर लेते हैं.
यह बात आप पेड से पुछ सकते तो बात थी, किसी किसी का व्यवहार पुरी जिन्दगी को बदल देता है..... लेकिन सारी पत्तिया तो नही उद जाती कुछ अच्छी पतियां वही पेड के कदमो मे ही दब कर खाद का काम करती है......
धन्यवाद इस गूड बात को बताने के लिये
एकदम दुरुस्त है ।
बिल्कुल, वर्तमान में जियें - द पावर आफ नाऊ पढ़ा जाये!
'फिर हम क्यूँ किसी और के व्यवहार के चलते अपने खुशी के समय को भी खराब कर लेते हैं.' -
बिलकुल सही कहा है आपने.
महावीर शर्मा
जीवन दर्शन सिखाती बहुत ही बढिया रही ये लघुकथा......
प्रकृति के माध्यम से जीवन-दर्शन की सुंदर प्रस्तुति । बधाई एवं अभिवादन स्वीकार करें ।
adamy srijnatmakta....mujhe protsahan dene ke liye main abhari hoon
एकदम सही, लेकिन ऐसा हर बार कहाँ हो पाता हैं? कहीं एक पेड़ खडा होता हैं अकेला, लेकिन बर्फिली आँधी उसे पहली बार में ही उखाड़ देती हैं.जड़ मजबूत होने से पहले ...... दूसरों का व्यवहार ऐसी ही आंधी हैं
एक लहर आती है, एक लहर जाती है,
आपस में मिल कर खुशियाँ मनाती है
बहुत खूब लिखा है।
www.amrithindiblog.blogspot.com पर भी आईये।
शुक्रिया।
ये बोधकथा बहुत सुन्दर है । एक और अंदाज़ ? लाजवाब बधाई
बस यही बात लोगों को समझ नहीं आती. भूत और भविष्य के चक्कर में अपना आज भूल जाते हैं.
जबकि सच यही है की जीना तो वर्तमान में ही होता है.
मन बाग़-बाग़ हो गया..
लघु कथा की अनमोल सीख..
बहुत ही अच्छा लगा..
आभार..
aapka ajeeb sa naam aapke blog tak kheench laya /
udan tashtari /
khoob /
shukriya sameer ji aap mere blog per aaye.umeed karti hun aage bhi aate rahenge.
...kya pata kal ho naa ho ...ye ahsas agar ho jaye to jeene ki kala seekh sakta hai manav.jeevan yahi sochkar jeena chahiye.
आपने लघुकथा के माध्यम से घर के बुजुर्ग के अकेलेपन के अहसास को जिया है
और अंत में आंसू पोछने की कोशिस की है। यह बात अच्छी और सच्ची भी है कि
जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता, कल हो न हो!!
फिर हम क्यूँ किसी और के व्यवहार के चलते अपने खुशी के समय को भी खराब कर लेते हैं.'
जानते हुए; समझते हुए भी विचलित तो हो ही जाते हैं. शायद यही पेड और मानव मे फर्क है.
जीवन चक्र को कितनी खूबसूरती से मोड दे दिया आपने । हर पल यहाँ जी भर जिओ ।
bas choti si.. pyari si... par dil ko choo gayee.....
आपके इसी ख्याल के हम कायल है !
एक बार फिर से नतमस्तक हूँ!
सादर
ओम
बड़ी गूढ़ मगर दिल को छूनेवाली बात पकड़ी है..
प्रकृति मूक रहकर भी जिंदगी जीने के कई रास्ते दिखा देती है ये आपकी इस लघु कथा से साफ झलकता है।
समीर जी,
आपकी इस लघुकथा को मैं लघुकथा कहूं---कविता या शब्द चित्र कहूं?क्योंकि इसमें मुझे एक लघुकथा,दार्शनिक कविता और शब्द चित्र तीनों का आनन्द और रस दोनों मिला है।शुभकामनायें।
हेमन्त कुमार
बहुत बढिया.
जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!
ये पते की बात कही ......!!
- -आज फिर उनसे मुलाकात होने को है. .....
कौन सी ....कार वाली....???
बहुत खूब श्रीमान जी, शुभकामनायें वृक्षों को भी और आप को भी
बहुत खूब, सरकार....बहुत खूब!
sameer ze apne kamal ka bimb gada hai. man ko chhu gaya. apki soch ka wavelength ko mera salam. kamal ka likha hai.
"जब मिले, जैसे मिले, खुशियाँ मनाओ! क्या पता-कल हो न हो!!"
समीर जी ,
बहुत गूढ़ भावों के साथ यह लघु कथा जीवन की खुशियों का मर्म समझा जाती है |
हर पल खुशियाँ खोजो ,
कल हो न हो !!!!
बहुत सुन्दर और सार्थक रचना !!!
Zindgi ka saar hai
aapki baat mein
har dukh ke baad sukh hai
Bilkul jeevant varnan kiya hai sir aapne.....Last ki do lines to jee li hamne..... aur waise bhi hamko nature se to bahut lagaav hai......is liye hal haal mein bhata hai
आपके शब्दों में ही कहूँ तो जबरदस्त बात कही है.
दिल को छू गई आपकी दार्शनिक बात|
सीधी सच्ची और गहरी बात कह दी आपने।
Aaj to aap kuch gambhir ho gaye.
Hansiye aur hansaiye..Kya pata kal ho na ho !
आपने बहुत बहुत बढीया लिखा है।
एक गाना
""जाने वाले पर एतबार ना कर
आने वाले का ईंतजार कर""
dil ko chhu gayee yah katha..
prateekon ke madhyam se bahut kuchh kah diya hai.
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