बुधवार, मई 16, 2007

का करें इन अनर्गल प्रलापियों का......

घाव लगता है कोई, गहरा लगा है
आपकी दहलीज पर, पहरा लगा है
दो पलों को सो गये जो रात में
आपको मालिक मकां, बहरा लगा है.


उपरोक्त पंक्तियाँ चिट्ठाकारी से संबंधित हैं. इन पंक्तियों में कवि ने टिप्पणी पर माडरेशन और वर्ड वेरीफिकेशन से जूझते लोगों की वेदना और इस तरह का सुरक्षा इंतजाम करने वालों का संदेश देने का प्रयास किया है. उद्देश्य है दुर्घटना से सुरक्षा भली. सभी एडस विरोधी जागरुकता अभियान के हिमायती भी इस नारे से सहमत हैं और इसको प्रमोट कर रहे हैं. कहीं कुछ गड़बड़ हो जाये, उससे बेहतर है कि सुरक्षा के उपाय पहले से कर लो वरना कहने वालों का क्या है वो तो कह कर निकल जायेंगे-"अब पछतावे क्या होत है, जब चिड़िया चुग गई खेत." कवि हृदय विशाल होता है. वह चिंतनशील होता है. वह भावुक होता है और उसकी सोच अनंत होती है. वह पागलपन की हद तक सोच सकता है, ऐसा वह सोचता है. वह किसी भी बात का काव्यात्मक छंदमय विवरण कर सकता है, वो ऐसा भी सोचता है. आजकल अगर वो नामी है तो वो कवि कोकिल-कंठी होता है. जितनी मधुर आवाज, उतना सशक्त प्रस्तुतिकरण और उतना नामी कवि. वो स्वरों का उतार चढ़ाव जानता है बिना उसके उसकी कविता कारगर नहीं होती. कविता का अर्थ निकले, यह आज की नव-कविता में आवश्यक नहीं. कविता में छंदात्मक प्रवाह हो, उसमें स्वर निकले और कंठ मधुर हो, यह आज के सफल मंचीय कविता और कवि के सूत्र हैं. बात उद्देश्य से भटक गई हमेशा की तरह. यह बात की प्रवृति है. बहता पानी, जहाँ भी ढलान दिखी, बह चले. आवश्यक नहीं कि वहाँ आवश्यक्ता हो. हमारे जैसा कम बात करने वाला भी बह जाये तो यह बात की तारीफ है, हमारी नहीं.

तो बात कर रहे थे उस मुक्तक की जो उपर लिखा गया है. उसका भावार्थ दर्शाने का प्रयास था.

प्रथम पंक्ति में :

घाव लगता है कोई, गहरा लगा है

कवि कहना चाह रहा है घिघियाते हुये कि भाई साहब, कहाँ इतनी दिक्कत में फँस गये. लगता है कहीं मन माफिक रच रच कर की गई टिप्पणी छपी नहीं. अगले ने माडरेशन में मिटा दी और आपके मन के भाव की भ्रूण हत्या हो गई. इस बात का तो हम भी विरोध करते हैं. इसके लिये तो आंदोलन की बनती है. स्टेट ट्रांस्पोर्ट की बसों में आग लगाने की बनती है. भ्रूण हत्या को हत्या का दर्जा मिलना चाहिये जिसकी सजा को माफ करने का अधिकार मात्र आज कलाम जी को है और कल अटल जी को होगा. भैरों सिंग जी को तो बिल्कुल भी नहीं. सर्व सम्मती भी तो आखिर कोई चीज है और वो भी सर्व दलीय. वैसे जब तक अटल जी अपनी हामी पॉज के साथ भरें , कोई और ही न अपाईन्ट हो जाये और या फिर कार्यकाल समाप्त हो जाये. बस यही चिंता खाये जा रही है. और कोई भी इस योग्य नहीं. माफी हो जायेगी, यह भी तय है. जब अफजल को हो सकती है तो यह टिप्पणी महाशय तो अभी पैदा भी नहीं हुये थे.


अब अगली पंक्ति:


आपकी दहलीज पर, पहरा लगा है

यानि यह कहा जा रहा है कि आपके दहलीज पर टिप्पणी करना आसान नहीं. वो माडरेशन में चली जाती है, फिर अप्रूव हो या न हो. और उस पर से पहरा शब्द का बोल्ड होना यह दर्शाता है कि सिर्फ माडरेशन ही नहीं है बल्कि वर्ड वेरीफिकेशन भी चालू है. क्या भाई, अंग्रेजी पढ़ने का इम्तिहान ले रहे हो कि अपनी रक्षा में जुटे हो. आगे, दहलीज का अर्थ चिट्ठे से है जो कि विषय वस्तु है अतः प्रधान की भूमिका में है.


अगली पंक्ति:

दो पलों को सो गये जो रात में

अब चूंकि हिन्दी चिट्ठाकारी अंतर्राष्ट्रिय स्तर पर हो रही है तो टाईम डिफ्रेंस भी स्वभाविक है. जब भारत में सुबह होती है तो दुबई-कुवैत में दोपहर..लंदन में शाम और अमरीका-कनाडा में रात. ऐसे में यह हमेशा हो जाना संभव है कि जब आप टिप्पणी करें तब वो चिट्ठाकर सो रहा हो. वो आपकी चित्कार व दुत्कार व तारीफी शब्द न सुन पाये, नींद के आगोश में और

चौथी पंक्ति के तहत:

आप उसे बहरा समझ बैठें. मालिक मकां यानि चिट्ठे का मालिक...अरे भाई, वो मात्र सोया है, बहरा नहीं हुआ है. उठेगा तब सुन लेगा. मगर यह व्यवस्था का कमाल है कि संयम खत्म हो गया है. अभी हमने आवाज की और अगर अगले ने तुरंत नहीं सुना का अर्थ कामचोरी, घूस की मंशा और लाल फीताशाही ही लगाना उचित है. अन्य बातों की न तो अहमियत है और न ही गुंजाईश. इस तरह उसे बहरा मान लेना ही बेहतर है.

अगर अहमियत और गुंजाईश चाहिये तो यह माडरेशन और वर्ड वेरीफिकेशन को उखाड़ फैंको और खुल्ला खेल फर्रुख्खाबादी का नाराबुलंद करो. गाली बकने वाले और अनर्गल प्रलापी इंतजार में हैं. और आपका बहरापन अलविदा की बाट जोह रहा है. Indli - Hindi News, Blogs, Links

22 टिप्‍पणियां:

अनूप शुक्ल ने कहा…

आप समर्थ कवि लेखक हैं। आपके लेख से आपकी बात की पुष्टि भी होती है-कवि हृदय विशाल होता है. वह चिंतनशील होता है. वह भावुक होता है और उसकी सोच अनंत होती है. वह पागलपन की हद तक सोच सकता है, ऐसा वह सोचता है. आपकी सोच अनंत तक फ़ैली है। दूसरी हदें भीं इनमें शामिल हैं!

Pankaj Bengani ने कहा…

बोल तो दिया आपने ... अब देखता हुँ यह टिप्पणी कहाँ जाती है.. दूध का दूध पानी का पानी :)

हा हा...

वैसे यह चार पंक्तियाँ बहुत ही अच्छी लगी. लेखनी की धार अब आर पार हो रही है. :)


मेरी बकवास भी सुन ही लीजिए:


नाम बदल लुँ, चेहरा छुपा लुँ.
बकवास बक दूँ और ईज्जत भी बचा लुँ.

मैं धर कर अनर्गल नाम कई,
गन्दगी फैला दुँ, घर भी सँवार लुँ.

Pankaj Bengani ने कहा…

ये क्या!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


मोडरेशन में गई?????????????????????

नहींह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह

आलोक पुराणिक ने कहा…

पागलपन रचनात्मक की पहली शर्त है। गैर-पागल अच्चे एकाउंटेंट हो सकते हैं. अच्छे वकील हो सकते हैं। अच्छे जज हो सकते हैं। रचनाकार नहीं हो सकते। पागलपन के महामार्ग से गुजरे बगैर रचनाकारिता की मंजिलें नहीं मिलतीं। ऐसा इस पागल का मानना है।
आलोक पुराणिक

संजय बेंगाणी ने कहा…

किसी सुत्र को पकड़ कर पहले मुक्तक लिखना, फिर उसकी विवेचना करना, कमाल है भाई!
बहुत खुब लिखा.

अभय तिवारी ने कहा…

मैं आपका समर्थन करता हूँ..

अरुण ने कहा…

बहुत सही कहा आपने पर शायद इस दर्द का एहसास मेरे पाले पार के पुराने दोस्तो को नही हो सकता ,सभ्यता सुसंकृति,सामाजिकता तमीज तहजीब कोई भी खुदा के घर से लेकर नही आता वो उसे मा बाप से मिलती है वहा से भी ना मिले तो आदमी का बच्चा अडोस पडोस से सीख लेता,वहा भी ना मिले तो जिस माहौल मे वो उठता बैठता है वहा से मिल जाती है पर शायद उन्होने न सही परवरिश पाई न ही सही दोस्त,ने पुराने अपने लेख मे लिखा भी है पर जिसके शायद जनम मे ही खोट हो जिसने जनमते ही घुट्टी मे घटिया पन के अलावा कुछ न पाया हो वोह और क्या कर सकते है इसके आगे न कुछ सोच सकते है न ही कुछ और करने का सामर्थय उनमे होता है
आप इस बात को इतना दिल पर ना ले मै पहले भी अपने पोस्ट पर लिखी टिप्पणीया मिटाता रहा हू आगॆ भी मिटाता रहूगा,माफ़ी चाहाता हू की रात मै देख नही पाया और वो सारी रात लोग देखते रहे,जब मै उनके लिखे हुये पोस्ट पर अपने विचार व्यक्त करता था तब यह रोजाना की बात थी,पर अब जबसे मैने उनकी और ध्यान देना बन्द किया है तब भी यदा कदा हर दो चार दिन बाद वे यह हरकत कर जाते है शायद अब भी उन्हे अपनी टी आर पी बढाने का यही तरीका ठीक लगता है ,पर मै अब खुले रूप मे अपने नई ड्रामा टेकनिक विजन"के दोस्तो से कहना चाहता हू खुल कर सामने आये व्यंग तो हम ता उम्र लिखलेगे पर आपसे अभी भि दो चार करने मे पीछे नही है,पर आप नारद को क्यो अपनी घटिया मानसिकता के प्रदर्शन का अड्डा बनाना चाहते हो लेकिन ये धमकी नही है अब अगर बात शुरु हुई तो दूर तक जायेगी

अरुण ने कहा…

भाई गुजारिश है छाप ही देना जो होगा मै झेल लूगा आपको बहुत बहुत धन्यवाद कि आपने इतना गंभीरता से लिया और ये मेरा आपसे वादा है अब हर संभव कोशिश उस और न जाने की होगी ये छापने के लिये नही है

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey ने कहा…

आप समर्थ-समर्थ-समर्थ हैं. अपन भी जब अनंत तक सोच लेंगे तो आपको लपेटेंगे. दिक्कत यही है कि अनंत सोच के लिये हमें अनंत समय चाहिये.
या आज कोई मस्त कविता पुस्तक खरीदते हैं. उसमें से टीप कर लिखेंगे.

प्रभात टन्डन ने कहा…

वाह भाई वाह! क्या संदर्भ सहित भावार्थ है ! एक कवि ही कवि के दर्द को समझ सकता है ।

प्रियंकर ने कहा…

का हो बाबू साब . पगला गए हैं का . का तो सब लिखते हैं . होशियार जनता चुकड़िया में गुड़ फ़ोड़ रही है, अउर आप हैं कि खुला खेल फ़रुखाबादी की बकालत कर रहे हैं.

सटक गए हैं का .

रंजू ने कहा…

bahut khoob likha hai ..har rachana ka andaaz aapka alag alag hota hai [:)]

rachana ने कहा…

मूल बात के साथ जो अन्य बातो‍ को व्यंग मे समेटा गया है, वो ज्यादा पसंद आया..
// वह पागलपन की हद तक सोच सकता है, ऐसा वह सोचता है //
व्यंगकार भी पागलपन की हद तक सोच सकता है, लेकिन वो एसा नही सोचता! :)

शैलेश भारतवासी ने कहा…

वैसे समीर भाई,

पहली बार मैं आपका ऐसा लेख पढ़ रहा हूँ जो इतना सटीक है और सार्थक है। या तो आप जान बूझकर हमें बरगलाते थे, या अब आप सुधार की राह पर हैं। आप ठीक ही कह रहे हैं-

आवश्यक नहीं कि वहाँ आवश्यकता हो. हमारे जैसा कम बात करने वाला भी बह जाये तो यह बात की तारीफ है, हमारी नहीं

अब उम्मीदें बढ़ गई हैं।

राकेश खंडेलवाल ने कहा…

ताला खोलो, परिचय दो फिर अपना आईडी कार्ड बताओ
तब ही संभव हो सकता है कुछ चिट्ठों पर जा टिपियाओ
सही कह रहे आप, तरीका एक सभी में उत्तम ज्यादा
जहां दिखे ताला, उस दर से उल्टे पांव लौट कर आओ.

अब जो ताला यहाँ लगा है, उसको हमें खोलना आता
ये ही कारण , कुंजी पट इस चिट्ठे पर खुद ही टिपियाता
बात काबिले गौर सभी हैं जितनी लिखीं आपने प्रियवर
आप अगर यह काम न करते, तो फिर और कौन समझाता ?

राजीव ने कहा…

गाली बकने वाले और अनर्गल प्रलापी इंतजार में हैं.
बहुत सही... क्या बात है! हम तो उनका भी स्वागत करते हैं, आखिर इस काम में भी वे संवाद तो स्थापित करना चाहते हैं!


आलोक जी ने भी सटीक कहा कि रचनात्मकता के लिये पागलपन आवश्यक है}

Divine India ने कहा…

विनोद पूर्ण हास्य करना कोई आपसे सीखे…।
बातों को तो अन्य रुप देकर अच्छा व्यंग भी हुआ है…। बहुत सुंदर्…।

sunita (shanoo) ने कहा…

बहुत सुंदर मुक्तक है और भावार्थ भी सही जैसे हमेशा आप हर बात हसाँते-हसाँते बताते है।
मै आपकी हर बात के पक्ष में हूँ...
सुनीता(शानू)

उन्मुक्त ने कहा…

देखना है कि कितने लोग वर्ड वेरीफिकेशन हटाते हैं।

बेनामी ने कहा…

Sameer Bhai'

aapka andaaz niraala hai.Dekho jab kal hum our aap is vishay par baat kar rahe the, tab maine socha bhi naa tha ki aap is disha me is tarah soch rahe ho...Gajab ho guru....:) Ab to soch kar baat karna baat karna padega,,,kahin hume hi naa lapet lo...... :)

--Khalid

Shrish ने कहा…

धन्य हैं हे कविवर महान, टिप्पणीकार का दर्द किया बयान।
प्राप्त हुआ हमें अनुपम ज्ञान, अब टिप्पणी दे करें कल्याण।

Udan Tashtari ने कहा…

आप सबका बहुत आभार .पढ़ते रहें पढ़ाते रहें. आते रहें, बुलाते रहें. धन्यवाद, मन आनन्दित है आप सबकी टिप्पणियां पाकर.